गुरुवार, जुलाई 09, 2009

बाज़ार से गुजरा था, खरीदार नहीं था -विल्स कार्ड भाग ४

पिछले दिनों विल्स कार्ड भाग १ , भाग २ और भाग ३ को सभी पाठकों का बहुत स्नेह मिला और बहुतों की फरमाईश पर यह श्रृंख्ला आगे बढ़ा रहा हूँ.

(जिन्होंने पिछले भाग न पढ़े हों उनके लिए: याद है मुझे सालों पहले, जब मैं बम्बई में रहा करता था, तब मैं विल्स नेवीकट सिगरेट पीता था. जब पैकेट खत्म होता तो उसे करीने से खोलकर उसके भीतर के सफेद हिस्से पर कुछ लिखना मुझे बहुत भाता था. उन्हें मैं विल्स कार्ड कह कर पुकारता......)

आज उन्हीं विल्स कार्डों में से कुछ और, एक साथ एक पुराने रबर बैण्ड से बँधे निकाले. शायद एक ही मूड के होंगे इसलिये एक साथ बाँध दिया होगा.

हमारी यादों की दराज भी तो ऐसी ही होती है, एक मूड की यादें एक बस्ते में बंद एक दराज के अंदर.

मैं मुम्बई में गिरगांव रोड, ओपेरा हाऊस के सामने चर्नी रोड पर रहा करता था एक हॉस्टल में. दक्षिण मुम्बई का व्यापारिक इलाका, मुख्य चौपाटी से लगा हुआ. जो लोग बम्बई के भूगोल से वाकिफ हैं वो समझ जायेंगे कि मैं किस इलाके में रहता था और कुछ ही दूर पर बम्बई का नजारा क्या हैं. फॉकलैण्ड रोड, पीला हाऊस, कांग्रेस हाऊस का मुज़रा, ग्राण्ट रोड़, नाज़ सिनेमा के पास लेमिंग्टन रोड का बदनाम इलाका..सब मानो मेरे हॉस्टल को घेरे ले रहे हो. टहलने निकलो तो गाड़ियों की चिल्ल पौं के बीच तबलों की थाप और घुंघरुओं की छनक.

एकदम नजदीक से देखा है -द कांग्रेस हाऊस-कैनेडी ब्रिज से लगे कोठे और उस ब्रिज पर पर घूमते दलाल, आपको आपकी हैसियत से उपर का अहसास दिलाते- क्या साहब!! एन्जॉय करना मांगता क्या? ए क्लास गर्ल!! एक अजब सा अहसास होता...गिजगिजा सा..गर्ल-ए क्लास..ये कैसी डेफिनिशन..ईश्वर ने तो ऐसे नहीं गढ़ा था.हम मानव अपनी सुविधा से कैसा वर्गीकरण कर देते हैं और सब समझने भी लगते हैं..

अब जब सब आस पास है तो कैसे न सामना हो..कभी कुछ और कभी कुछ वजह मगर काफी करीब से जाना. एक पूरा अलग सा फलसफा है इस तरह की जिन्दगी का, गर समझो तो.

हॉस्टल के करीब जो कोठा था, उसकी मालकिन से तो उस राह से आते जाते एक पहचान सी हो गई..एक अपनापन सा..उसकी ढ्योरी चढ़ने की हम हॉस्टल में रहने वालों को इजाजत न थी. वो हम हॉस्टल के लड़कों को अपना बेटा मानती. इन्सान ही तो थी, दिल रखती थी एक अलग सा..धंधे से जुदा. जाने क्यूँ और कब सब अड़ोसियों पड़ोसियों की तरह उसे मौसी बुलाने भी लगा-गंगा मौसी. मेरी नजर में तो वो बस मौसी थी और बस मौसी..एक आदरणीया..जो प्यार देना जानती थी अपने बच्चों को!!

आज भी याद करता हूँ अक्सर उस गंगा मौसी को..जाने कहाँ होगी वो. उस बाजार में अस्तित्व की उम्र बहुत थोड़ी होती है.

उसी दौरान बहुत कुछ अहसासा-कभी यूँ ही गुजरते, कभी यूँ ही सोचते और अहसास शब्द बन उतरे विल्स कार्ड पर जबकि मौसी तो हमेशा रोकती थी सिगरेट पीने को. मगर वो यादें उन्हीं विल्स कार्डों पर सहेजी गईं, शायद मौसी भी ये न जानती थी वरना कभी मना न करती.

उसी माहौल और वातावरण को मद्दे नजर रख उस दौरान लिखे गये कुछ कार्ड, चौंकियेगा मत इस अँधेरे को देख कर!! अक्सर ही उजाले में खड़े हो लोग इस अँधेरे की तरफ देखने से कतराते हैं.

अहसास करिये पाक आत्मा की भावनाओं की उसी तह को जिनसे ये उभरी हैं:

आत्मा तो हमेशा पाक होती है..
ये मुए कर्म हैं
जो परिभाषित होते हैं -
सतकर्म और दुष्कर्म में.


खिड़कियों से झांकती आँखें

और

एक जिन्दगी यह भी

*१*

कारों के चलने की आवाज
बसों की घरघराहट
उनके भोपूंओं का चिल्लाना
समुन्दर की लहरों की हुंकार
और उनके बीच
गुम होती
उस लड़की की चीख...
इस शहर में एक अजब
दम घोटूं
सन्नाटा है!!


*२*

वो
कातर निगाहें
जाने किस आशा से
खिड़की पर खड़ी
मुझे देखती रहीं ..
और
मैं
पूर्ण स्वस्थ
युवा
एकाएक
कर पाया
अपनी नपुंसकता का अहसास!!

*३*

कुछ सपने
वहाँ भी दिखते होंगे
कुछ अरमान
वहाँ भी जगते होंगे
जो दम तोड़ते होंगे
उस ६ बाई ६ के कमरे में
हर नये ग्राहक के
बोझ तले दब कर!!

हाय! कितनी छोटी उम्र है...

उन सपनों की
उन अरमानों की
बिल्कुल
उस ६ बाई ६ के
कमरे की तरह!!


*४*

वो
तबलों
और
हारमोनियम के साथ
थिरकते घुंघरुओं की आवाज..

वो फूलों की महक
और
इत्र की तीखी खुशबू..

वो खामोश उदासी..

वो मजबूरी की सड़ांध...

-बाज़ार से गुजरा हूँ आज!!


*५*

मजबूरियों की बेडियाँ

लोहे की बेडियों से

मजबूत देखी है मैने..

खिड़कियों से झांकती

कितनी ही आँखें

मजबूर देखी हैं मैने..

*६*

सोचती है

कहीं कुछ

रियाज़ में कमी होगी..

वरना

उसकी अदाओं से रीझे

सब चले आते हैं..

नहीं आती तो बस

मुई!! मौत नहीं आती...

रियाज़ कुछ बढ़ाना होगा!!


*७*


वो नाम बताती है

शमा!!

दूसरी वाली

शन्नो!!

तीसरी

लाजो!!

ये वो बाज़ार है

जहाँ तन बिकता है...

नाम में क्या रखा है?

शेक्सपीअर याद आते हैं!!

*

चित्र साभार: गुगल

सोमवार, जुलाई 06, 2009

मैं नॉन प्रेक्टिकल कहलाया..निहायत फालतू!!

पिछले हफ्ते किसी परिवारिक प्रयोजन में मॉन्ट्रियल जाना हुआ.

६०० किमी की यात्रा और ड्राईविंग लगभग ५ से सवा ५ घंटे की.

पत्नी बाजू में बैठे बतियाती हुई पूरे ५ से सवा ५ घंटे जागृत रखने में सक्षम फिर भी कॉफी साथ में रख ही ली कि आराम रहेगा.

हाईवे घर से बाजू में ही है तो ५ मिनट में पहुँच गये और स्पीड पूरे १२० किमी प्रति घंटे की रफ्तार से मिलाकर सामने और पीछे वाली गाड़ी से एक समदूरी बना कर जाँच लिया कि वो भी १२० पर हैं और क्रूज लगा कर गाना सुनने में मग्न हो गये. पत्नी की समझ से उसकी बात सुनने में, जिसमें मात्र हां हूं करना ही एकमात्र उपाय है. बहस या तू तकड़ की गुँजाईश ही नहीं. (डिटेल न पूछना)

क्रूज यह सुविधा दे देता है कि जिस स्पीड पर आपने क्रूज लगा दिया, गाड़ी उसी पर चलती रहेगी. अब आपको एक्सीलेटर या ब्रेक पर पाँव धरे रहने की जरुरत नहीं. सड़कें भी अधिकतर एकदम सिधाई में चलती हैं तो स्टेरिंग पर भी एक उँगली धरे रहना पर्याप्त है.

बीच बीच में पीछे वाली गाड़ी को बैक मिरर में देख ले रहे थे और सामने वाली तो दिख ही रही थी.

सामने ट्रक था, जिसमें ढेरों सुअर लदे चले जा रहे थे और पीछे नीले रंग की पोन्टियक. एक भद्र महिला उसे चला रही थी लगभग ३५ से ४० साल के बीच की. यह उम्र यूँ हीं नहीं लिख दी है. एक लम्बा अनुभव है इसे आँकने का, कम से कम महिलाओं के मामले में. अब तक तो ९९% सही ही गया है. यह बालों की सफेदी जो आप मेरे फोटो में देखते हैं वो घूप की वजह से नहीं है. अनुभव है मित्र. धूप ने तो सिर्फ चेहरे के रंग पर कहर बरपाया है.

सुअरों से लदा ट्रक

जब बैक मिरर में नज़र डालूँ वो देखती मिले. मैं मुस्कराऊँ ( अरे, संस्कार का तकाजा है और कुछ नहीं) और वो मुस्कराये. बस, और क्या?

सामने का ट्रक- सुअर लादे, सुअर की तरह घूँ घूँ की आवाज के साथ चला जा रहा है. हालांकि खिड़कियाँ बंद होने के कारण घूँ घूँ की आवाज डिस्टर्ब नहीं कर रही थी. उसके साईड मिरर में ड्राईवर नजर आ रहा है. उम्र न जाने क्या हो, पुरुष की उम्र, मैं आँकने में सक्षम नहीं क्यूँकि पुरुष तो किसी भी उम्र में कब क्या कर गुजरे, कहना मुश्किल है. विकट मानसिकता होती है उसकी और अजब फितरत.

कुछ ही समय में एक सबंध सा स्थापित हो गया. हमसफरों को रिश्ता. कुछ दूर ही सही, तुम मेरे साथ चलो..टाईप. सामने ट्रक देखने की आदत पड़ गई और पीछे उस महिला को. अरे, उसने तो सिगरेट जला ली. मन किया कि उसे मना करुँ, यह अच्छी आदत नहीं. मगर कैसे और किस अधिकार से? फिर भी एक जुड़ाव की भावना, मात्र कुछ देर कदम से कदम मिला कर चलने पर. लगता है कि डांटूं उसे. मगर सोचता हूँ कि बड़ी हो गई है. अच्छा बुरा समझती है, क्या कहना उससे. कहते हैं कि जब बेटे के पैर में अपने जूते आने लगे तो अधिकार छोड़ उसे दोस्त मान लेने में ही भलाई है. बुढ़ापा ठीक कटेगा. यही कुछ सोच कर जाने देता हूँ.

सामने ट्र्क को देखता हूँ. सुअर लदे हैं. एक छेद से मूँह निकाले ठंडी हवा की मौज लेने की फिराक में दिखा. उसे क्या पता कि गंतव्य पर पहुँचते ही मशीन उसे फाइनल नमस्ते कहने का इन्तजार कर रही है. उस पर गुलाबी निशान है और बहुतों की तरह. शायद गुलाबी मतलब, पहला स्टॉप. तो वहीं कटेगा और फैक्टरी में से दूसरी तरफ पैकेट में पैक निकलेगा पीसेस में बिकने को.

छेद से झाँकता सुअर

वैसे ये तो हमें भी पता नहीं कि कौन सा निशान हम पर लगा है, तभी तो गाना सुनते, कॉफी पीते, पत्नी की चैं चैं (सॉरी, बातचीत) सुनते, पिछली कार में महिला को ताकते, कोई बुरी नजर से नहीं, चले जा रहे हैं खुशी खुशी.

अगर निशान कब मिटेगा पता चल जाये तो आज जीना दुभर हो जाये एक पल को भी. सही है सुअर महाराज, लूटो मजे ठंडी हवा के. मस्त है यह पावन पवन और बहती समीर!!

३०० किमी पर ऑटवा को मुड़ने का एक्जिट आता है और ट्रक निकल लेता है उस पर. हमें सीधे जाना है मांट्रियाल की तरफ. मन में एक खालीपन सा आ जाता है कि कहाँ चला गया मेरा हमसफर. जाने किस हाल में चले जा रहा होगा. खैर, मिलना, बिछुड़ना जीवन का क्रम है, यह सोच मन को मना लेता हूँ और पीछे बैक मिरर पर नजर डालता हूँ.

वो मुस्कराती है, मैं मुस्कराता हूँ. वो सिगरेट पी रही है और मैं कॉफी. उसे शायद कॉफी के खतरे मालूम होंगे और वो भी मुझे रोकना चाहती हो. कौन जाने?

१०० किमी और बीते. इस बीच चार पाँच बार झूटमूठ मुस्कराये. फिर कोबर्ग आया और वो भी निकल गई उस राह और मै अकेला..मांट्रियल गंत्वय के लिए..आगे बढ़ता..और मन गुनगुना रहा है फुरसतिया जी के मित्र ’प्रमोद तिवारी’ का गीत:

राहों में भी रिश्ते बन जाते हैं
ये रिश्ते भी मंजिल तक जाते हैं
आओ तुमको एक गीत सुनाते हैं
अपने संग थोड़ी सैर कराते हैं।..... (बाकी लिंक पर पढ़ें, सुन्दर गीत हैं)


-कहाँ जा पाये मंजिल तक..राह में ही साथ छोड़ गये. मगर यह तय है कि एक रिश्ता कायम कर गये. उन्हें तव्वजो देना या न देना, यही सारी बात तो हमारा खुद का स्वभाव निर्धारित करता है. शायद साथ की मंजिल वही रही हो.

चाहें तो उसे भूल जाये, मगर मैं नहीं भूल पाता...भूल जाना बेहतर माना जाता है...कुछ लोग इसे प्रेक्टिकल होना कहते हैं.

-मैं नॉन प्रेक्टिकल कहलाया..निहायत फालतू विचारधारा का पालक!!



रिश्तों और नातों के
बीच कुछ
इस तरह से
बंट गया हूँ मैं..
कि
खुद से..
कट गया हूँ मैं....

-समीर लाल ’समीर’

बुधवार, जुलाई 01, 2009

ॐ जय बेनामी देवा!!!

आजकल पूरे ब्लॉगजगत में बेनामियों का तहलका है. बिना नाम के मन मर्जी अनाप शनाप, अच्छी बुरी जैसा जी आया, टिप्पणी कर गये, अब आप आपस में लड़ते रहो. वो बीच बीच में आकर हवन सामग्री और घी डालते रहेंगे. न जाने उनके पक्ष विपक्ष में, उनसे बचने के उपायों पर कितने आलेख लिखे जा चुके, सब बिना किसी हल के ही रहे. कोई भी एकदम सफल और कारगर उपाय बताने में असक्षम रहा. कुछ तो उन्हें पकड़ने के लिए अभी भी जाल बिछाये बैठे हैं मगर हाथ लग रहा है वही सिफर.

बचपन से समझाया गया है कि जब कोई रास्ता न दिखे तो बस, ईश्वर की शरण में चले जाओ. खूब आरती भजन पूजन में मन लगाओ, कुछ न कुछ हल भगवान दिखा ही देगा. उसके पास और कोई काम भी क्या है, बाकी तो सब इन्सानों ने उससे छीन ही लिया है.

बस, उन्हीं संस्कारों की गठरी बाँधे हम तो शुरु हो गये हैं-दिन में दो बार पूरे झाम से बेनामी याने बिन नामियों की आरती उतारने में. बड़ा फायदा लग गया है. अतः, विचारा कि आम जन की साहयतार्थ स्वामी समीरानन्द जी के आश्रम से यह आरती सब लोगों तक पहुँचाई जाये.

बेनामी महाराज!!

चाहें तो इस रिकार्डिंग को अपने ब्लॉग पर लगा लें और सुबह शाम बजा दिया करें या जैसे ही कम्प्यूटर ऑन करें, इसे गाकर फिर ब्लॉगलेखन में जुटें, निश्चित फायदा मिलेगा. फायदे का वादा वैसा ही है जैसा मानसून को बुलाने और गरमी को भगाने जगह जगह आरतियों और यज्ञों के पंडाल से किया जा रहा है इस वक्त भारत में. कितनी जगह तो इन आरतियों के प्रताप से मानसून बड़ी सून आ गया और बाकी जगह भी आ ही जायेगा. मानो कि आरती न होती तो मानसून आता ही न!! जय हो!!

तो नीचे आरती सुनिये, पढ़िये, समझिये, गुनिये और गुनगुनाईये. धुन और आवाज इलाहाबद के एक पंडे से कॉपी करने की कोशिश की है: :)




ॐ जय बिन नामी देवा, स्वामी जय बे नामी देवा
तुमको पकड़ न पाये, गुगल की सेवा.

ॐ जय बिन नामी देवा....

क्म्प्यूटर के जोधा, करते हैं धंधे
तुमको खोज सके न, हो गये वो अंधे

ॐ जय बिन नामी देवा....

तुम नर हो या नारी, सब अनुमान करें
ब्लॉगजनों मे हर कोई, हर पल खूब डरें

ॐ जय बिन नामी देवा....

कितनी मेहनत करके, टिप्पणी हो करते
फिर काहे को अपना, नाम नहीं धरते.

ॐ जय बिन नामी देवा....

तेरी सब पर नजरें, तुम से कौन बचा
ब्लॉगजगत में कितना, तुमसे विवाद मचा..

ॐ जय बिन नामी देवा....

तुम हो अगम अगोचर, कभी नहीं थकते
किस बिधि बचूँ दयामय, गाली तुम बकते.

ॐ जय बिन नामी देवा....

तुमसे उसने सीखा, कैसे बात करें
कुछ न कुछ तो कह दें, काहे मौन धरें...

ॐ जय बिन नामी देवा....

तुम हो ज्ञान के सागर, अपना ब्लॉग लिखो
छुप कर के क्या जीना, खुल कर खूब दिखो!!

ॐ जय बिन नामी देवा....



-समीर लाल ’समीर’

निवेदन:
.कोई भक्त अगर इसे करयोके पर मय ढपली, मंजिरा और शंखनाद आदि के संग गाये तो कृप्या रिकार्डिंग आश्रम तक भी पहुँचाये और साथ ही स्वामी समीरानन्द का क्रेडिट भी लगा देगा तो स्वामी जी प्रसाद स्वरुप टिप्पणियों की मानसून का वादा करते हैं.

. यदि किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँची हो तो कृप्या बेनामी टिप्पणी न करें, हम तो पहले ही क्षमा मांग लेते हैं. :)

सोमवार, जून 29, 2009

किस बात का गुस्सा? कहीं कोई भय तो नहीं?

पहली मंजिल की खिड़की पर बैठा बैकयार्ड में बगीचा देख रहा हूँ. मौसम बहुत सुहाना लग रहा है.

विज्ञान ने यह संभव कर दिया है कि मौसम चाहे कैसा भी गरम या ठंडा क्यूँ न हो, आप अपने घर का तापमान अपने मन के अनुरुप ढाल कर बाहर शीशे से निहारें और प्रसन्न रहें. क्या फरक पड़ता है बाहर के तापमान से, जब कमरे में ही बैठे रहना हो.

ऐसी सुविधा विज्ञान ने तन के लिए दी और हम ऐसे आदी हुए कि मन नें भी वही आदत बना ली. तन की संगत का असर होगा. कहते हैं न कि संगत अपना प्रभाव छोड़ ही देती है. अब तो कौन कितनी तकलीफ में है या खुश हैं, उससे मन न तो विचलित होता है और न खुश. मायने रखता है तो बस इतना कि क्या हम पर दुख गिरा है या हमें खुशी मिली है. बस, वही कमरे का तापमान. सब कुछ उसी भी निर्भर है. हीटिंग ऑन कर दी तो गरम और कूलिंग चालू तो ठंडा. कितना गरम हो या कितना ठंडा, सब अपने ही हाथ तो है. अखबार की खबरें मात्र शब्द बन कर रह गई हैं. कोई अन्तर नहीं पड़ता. संवेदनाऐं मृत प्राय हो चली है.

खिड़की से देखता हूँ कि सेब के पेड़ में नये फूल आ गये है. कल यही फूल फल बन जायेंगे-मीठे मीठे लाल लाल सेब. एक स्वास्थयवर्धक और स्वादिष्ट फल. तभी एक काली, नारंगी रंग की मिली जुली चिड़िया जंगल से उड़ कर यहाँ चली आई है. सुना है उसे मैने बोलते. घर के बाजू में जंगल है. अक्सर टहलने जाते समय देखा है इस प्रजाति को. बहुत सुन्दर गाती है, बेहद मीठा. जंगल में टहलते, सामने ओन्टारियो लेक से आती शीतल बयार और उसके साथ इसका गायन, मन को आहलादित कर देता है. आज पहली बार उसे अपने बगीचे में देख रहा हूँ.

जंगल से आई: चिड़िया

न जाने किस बात का गुस्सा है. सारे सेब के फूल नोंच नोंच कर बिखराती जा रही है. बीच बीच में दो तीन और चिड़िया भी आ जाती है. कुछ इस तहस नहस में उसका साथ देती है. कुछ जोर जोर से चूँ चूँ कहती लड़ती हैं. शायद इनको समझा रही होंगी कि क्यूँ नुकसान कर रही हो? क्यूँ तोड़ रही है इन नई आती कलियों को और फूलों को? कुछ सब्र करो, फल तो आ जाने दो, तब खा लेना. पेड़ खुद खुशी खुशी खिलायेगा. पेड़ अपने फल खुद तो खाता नहीं, तुम्हारे लिए ही तो हैं. फिर ऐसी क्या नाराजगी कि तुम फूलों को ही खत्म किये दे रही हो.

समझाती होगी कि देखो, यही फूल हैं जिस पर आकर भ्रमर बैठेगे, गुनगुनायेंगे इस पेड़ से उस पेड़. साथ ही झील से आती पावन पवन भी इसके फूलों से पराग अपने साथ बहा कर दूसरे पेड़ तक ले जायेगी और नव सृजन होगा. नये पेड़ होंगे, नये फूल आयेंगे. नये फल होंगे. कितना खुशहाल वातावरण होगा.

कहती होगी कि अगर तुम फूलों का ही नाश कर दोगी तब फिर यह सब कैसे संभव हो पायेगा. नव सृजन ही रुक जायेगा. ये पेड़ भी पूरे परिपक्व होने के पहले ही खत्म हो जायेंगे. सूख कर बस ठूंठ. विचारो मित्र, हर तरफ बस ठूंठ ही ठूंठ. तुम्हारा तो सीमित जीवन है. अब तक उपलब्ध पेड़ पौधों से कट जायेगा पर आने वाली भावी पीढ़ियाँ, तुम्हारे बच्चे..उनका क्या होगा. वो क्या खायेंगे और कहाँ चहकेंगे?

मगर वो माने तब न!! अपने सुन्दर गाने का ऐसा दंभ, ऐसा धमंड कि फूलों की सुन्दरता कैसे बरदाश्त हो. बस, मिटा गई दिन भर में बगिया के दोनों सेब के पेड़.

अब उसमें इस बरस सेब नहीं आयेंगे. क्या पता आने वाले साल में भी आते हैं या नहीं. कल उन हरे भरे पेड़ों की जगह मेरी सुन्दर बगिया में भी ठूंठ होंगे. सोच कर ही दिल दहल जाता है. कितने प्यार से सींचा, संजोया था इस बगिया को. सब बस उस पागल चिड़ियों के दंभ के चलते मिट गया. वो तो वैसे भी जंगल में रहती थी और रह ही रही है, उसे क्या जरुरत आन पड़ी थी इस करीने से सजी बगिया में. शायद जंगल में अपनी पहचान ठीक से काबिज न कर पा रही हो या इस सुन्दर बगिया से घबरा गई हो कि इस बगिया के रहते भला जंगल में कौन आयेगा हरियाली निहारने और उसके गीत सुनने.

कैसे समझाऊँ उसे कि तुम्हारी महत्ता तुम्हारी जगह है ही और अगर बगिया में आती हो तो भी स्वागत करने सब फूल पत्ती फल खुला दिल लिए खड़े ही हैं फिर ऐसी क्या नाराजगी?

आज मुझे जंगली चिड़ियों की भाषा न आ पाने का बहुत दुख हुआ. काश, भाषा समझता होता तो मैं उनका मनतव्य तो जान लेता और उसके अनुरुप ही, उनमें न सही अपनी बगिया में ही कुछ बदलाव या सुधार कर लेता.

तो हे कलमपीरों, हे तथाकथित साहित्यकारों!! हमें दुख है कि हम आपकी भाषा नहीं बोल पाते, हम आपकी भाषा नहीं समझ पाते हैं!! हमारी अपनी छोटी सी बगिया है. नये पौधे रोपें जा रहा हैं. बड़े प्यार से उन्हें सींचा जा रहा है. स्नेह से दुलराकर बड़ा किया जा रहा है. कुछ में फूल भी आने लगे हैं. कुछ तो फलदायी वृक्ष भी हो गये हैं. स्वागत आपका भी है इस बगिया मे.

आप तो ज्ञानी हैं इसलिये भले हम न समझ पायें, आप तो हमारी बात समझ ही जायेंगे. बस!! अपने अहंकार पर काबू पा लिजिये और अपने दंभ को किनारे रख कर आईये. हम तो आपके आने से लाभांवित ही होंगे मगर, यह तहस नहस कैसी? कैसी यह नाराजगी? क्यूँ फूलों को नोंच ले रहे हैं. क्या पा लेंगे इससे? कहीं यह अपना असतित्व खो जाने का भय या इसी तरह की कुंठा तो नहीं?

ऐसा मत करों वीरों. याद है न वो ठूंठ वाली दुनिया. क्या आप वैसी दुनिया चाहते हो!!

चलिये, ऐसा कर लिजिये कि अगर नव-आगंतुको को उत्साहित करने से आपका कद घटता हो तो कम से कम हतोत्साहित न करिये.

वैसे, चलते चलते एक बात और बता दूँ, सेब का पेड़ भारत में लगे, जंगल में लगे या फिर विदेश में-सेब तो सेब ही होता है.मीठे मीठे लाल लाल सेब. एक स्वास्थयवर्धक और स्वादिष्ट फल.

ऐसे ही तो हैं?

नोट: अभी पिछले दिनों किसी कवि की कविता को लेकर किसी वरिष्ट साहित्यकार ने बहुत हंगामा खड़ा किया था कि उन्हें कविता लिखना नहीं आती, फिर भी लिख रहे हैं. फिर, दो-चार दिन पहले किसी वरिष्ट साहित्यकार द्वारा विदेशों में किये जा रहे हिन्दी लेखन को दौ कौड़ी का घोषित कर देना मन दुखी कर गया और उपरोक्त भाव उभरे.

गुरुवार, जून 25, 2009

कुछ विल्स कार्ड और...

दो रोज पहले हॉस्टल के मित्र, जो उस जमाने में मेरा रुम मेट हुआ करता था, का पत्र प्राप्त हुआ भारत से. बड़ा आश्चर्य का विषय था कि आज के जमाने में कोई पत्र लिखे. ईमेल से काम चला जा रहा है. लेकिन उसने मेरे ब्लॉग पर विल्स कार्ड पर उतरी बातें पढी और फिर यह पत्र भेजा.

(याद है मुझे सालों पहले, जब मैं बम्बई में रहा करता था, तब मैं विल्स नेवीकट सिगरेट पीता था. जब पैकेट खत्म होता तो उसे करीने से खोलकर उसके भीतर के सफेद हिस्से पर कुछ लिखना मुझे बहुत भाता था. उन्हें मैं विल्स कार्ड कह कर पुकारता......)

जाने कब और किस मूड में लिखे मेरे कुछ कार्ड उसके पास रखे हुए थे, वही उसने पत्र के माध्यम से भिजवाये. सोचता हूँ ऐसा कुछ खास था भी नहीं उसमें, फिर भी बस याददाश्त बतौर शायद रखे रहा होगा सहेज कर. इतने सालों से सहेजे इन चन्द कागज के टुकड़ों को अपने से अलग करते क्या अहसासा होगा उसने. एक टीस तो उठी होगी. मैं तो भूल भी चुका था फिर क्यूँ उसने वो मुझे वापस भेजा.बस सोच रहा हूँ. बरसों बीते उससे मुलाकात हुए भी. बहुत यादें जुड़ी हैं उस समय के साथ, उन प्यारे दोस्तों के साथ बम्बई की सड़के नापते, सारा समय अपना, अपनी मौज.

क्या भूलूँ क्या याद करुँ को चरितार्थ करता.

ज्यादा नहीं लिखता. भावुकता जकड़ने लगती है फिर उससे उबरने की जद्दोजहद, तो इतना ही लिख वो विल्स कार्ड नोट्स पेश कर देता हूँ.




-१-

कल मैं नहीं रहूँगा..

यह तय है..

रहोगे तो तुम भी नहीं..

फिर ये अकड़ कैसी ?



-२-

कब्र पर

खारे आंसूओं का सबब

कुछ अनकही बातें

और

अपूर्ण वादों का पाश्चाताप.



-३-

वो नहीं रहे...

अति दुखद..

रहोगे तो तुम भी नहीं..

ऐसा कुछ कर जाओ

कि कोई तो कहे..

अति दुखद!!


-४-

एक आम आदमी मर गया...

क्या आंसूं बहाना....

वो तो मरा ही पैदा हुआ था!!



-५-

वो मर गया

चलो,

आज उसका शरीर फूँक आयें...

आत्मा तो अपनी

उसने सालों पहले ही फूँक दी थी...

-नेता था हमारा!!


-६-

( बम्बई के छोटे से फ्लैट में रह रहे मेरे दोस्त के दादा जी मृत्यु पर मेरे दोस्त की माता जी के व्यक्तव के आधार पर-आज का भौतिकवाद)

बाबू जी नहीं रहे!!

हमारे परिवार की बगिया को

बिन माली कर गये....

बस, तसल्ली इतनी है कि

कमरा खाली कर गये!!


-७-

मेरी कलम से

निकलते

वो

नीले आँसूं

बरबस ही

खींच लाते हैं

तेरी आँखों से

वो

पनीले आँसूं

जो

लुढ़क कर

जब जा मिलते हैं

मेरी कलम के

उन नीले आँसूंओं से

तब छा जाता है

एक धुंधलका सा

अपने साथ लिए

सन्न सन्नाटा

और

गहरी उदास उदासी!!



-समीर लाल ’समीर’

सोमवार, जून 22, 2009

आप जलूल आना.....चोनू!!

जिन्दगी का सफ़र भी कितना अजीब है. रोज कुछ नया देखने या सुनने को मिल जाता है और रोज कुछ नया सीखने. पहले भी इसी पहलु पर कुछ सीखा था और आज नया सीखा.

पता चला कि दफ्तर की महिला सहकर्मी का पति गुजर गया. बहुत अफसोस हुआ. गये उसकी डेस्क तक. खाली उदास डेस्क देखकर मन खराब सा हो गया. यहीं तो वो चहकती हुई हमेशा बैठे रहती थी. यादों का भी खूब है, तुरन्त चली आती हैं जाने क्या क्या साथ पोटली में लादे. उसकी खनखनाती हँसी ही लगी गुँजने कानों में बेवक्त. आसपास की डेस्कों पर उसकी अन्य करीबी सहकर्मिणियाँ अब भी पूरे जोश खरोश के साथ सजी बजी बैठी थी. न जाने क्या खुसुर पुसुर कर रहीं थी. लड़कियों की बात सुनना हमारे यहाँ बुरा लगाते हैं, इसलिए बिना सुने चले आये अपनी जगह पर. हालांकि मन तो बहुत था कि देखें, क्या बात कर रही हैं?

जो भी मिले या हमारे पास से निकले, उसे मूँह उतारे भारत टाईप बताते जा रहे थे कि जेनी के साथ बड़ा हादसा हो गया. उसका पति गुजर गया. खैर, लोगों को बहुत ज्यादा इन्टरेस्ट न लेता देख मन और दुखी हो गया. भारत होता तो भले ही न पहचान का हो तो भी कम से कम इतना तो आदमी पूछता ही कि क्या हो गया था? बीमार थे क्या? या कोई एक्सीडेन्ट हो गया क्या? कैसे काटेगी बेचारी के सामने पड़ी पहाड़ सी जिन्दगी? अभी उम्र ही क्या है? फिर से शादी कर लेती तो कट ही जाती जैसे तैसे और भी तमाम अभिव्यक्तियाँ और सलाहें. मगर यहाँ तो कुछ नहीं. अजब लोग हैं. सोच कर ही आँख भर आई और गला रौंध गया.

हमारे यहाँ तो आज मरे और गर सूर्यास्त नहीं हुआ है तो आज ही सूर्यास्त के पहले सब पहुँचाकर फूँक ताप आयें. वैसा अधिकतर होता नहीं क्यूँकि न जाने अधिकतर लोग रात में ही क्यूँ अपने अंतिम सफर पर निकलते हैं. होगी कोई वजह..वैसे टोरंटो में भी रात का नजारा दिन के नजारे की तुलना में भव्य होता है और वैसा ही तो बम्बई में भी है. शायद यही वजह होगी. सोचते होंगे कि अब यात्रा पर निकलना ही है तो भव्यता ही निहारें. खैर, जो भी हो मगर ऐसे में भी अगले दिन तो फूँक ही जाओगे.

मगर यहाँ अगर सोमवार को मर जाओ तो शनिवार तक पड़े रहो अस्पताल में. शानिवार को सुबह आकर सजाने वाले ले जायेंगे. सजा बजा कर सूट पहना कर रख देंगे बेहतरीन कफन में और तब सब आपके दर्शन करेंगे और फिर आप चले दो गज जमीन के नीचे या आग के हवाले. आग भी फरनेस वाली ऐसी कि ५ मिनट बाद दूसरी तरफ से हीरा का टुकड़ा बन कर निकलते हो जो आपकी बीबी लाकेट बनवाकर टांगे घूमेगी कुछ दिन. गज़ब तापमान..हड्ड़ी से कोयला, कोयले से हीरा जैसा परिवर्तन जो सैकड़ों सालों साल लगा देता है, वो भी बस ५ मिनट में.

साभार: गुगल

खैर, पता लगा कि जेनी के पति का फ्यूनरल शनिवार को है. अभी तीन दिन हैं. घर आकर दुखी मन से भाषण भी तैयार कर लिया शेर शायरी के साथ जैसा भारत में मरघट पर देते थे. शायद कोई कुछ कहने को कह दे तो खाली बात न जाये इतने दुखी परिवार की. बस, यही मन में था और क्या.

शुक्रवार को दफ्तर में औरों से पूछा भी कि भई, कितने बजे पहुँचोगे? कोई जाने वाला मिला ही नहीं. बड़ी अजीब बात है? इतने समय से साथ काम कर रहे हैं और इतने बड़े दुखद समय में कोई जा नहीं रहा है. हद हो गई. सही सुना था एक शायर को, शायद यही देखकर कह गया होगा:

’सुख के सब साथी, दुख का न कोई रे!!’

आखिर मन नहीं माना तो अपने एक साथी से पूछ ही लिया कि भई, आप क्यूँ नहीं जा रहे हो?

वो बड़े नार्मल अंदाज में बताने लगा कि वो इन्वाईटेड नहीं है.

लो, अब उन्हें फ्यूनरल के इन्विटेशन का इंतजार है. हद है यार, क्या भिजवाये तुम्हें कि:

’भेज रही हूँ नेह निमंत्रण, प्रियवर तुम्हें बुलाने को,
हे मानस के राजहंस, तुम भूल न जाने आने को.’

हैं? मगर बाद में पता चला कि वाकई उनका फ्यूनर है STRICTLY ONLY BY INVITATION याने कि निमंत्रण नहीं है तो आने की जरुरत नहीं है.

गजब हो गया भई. तो निमंत्रण तो हमें भी नहीं आया है. फिर कैसे जायेंगे. कैसे बाँटूं उसका दर्द. हाय!!

सोचा कि शायद इतने दुख में भूल गई होगी. इसलिये अगले दिन सुबह फोन लगा ही लिया. शायद फोन पर ही इन्वाईट कर ले. चले जायेंगे. भाषण पढ देंगे. दो बूँद आँसूं बहा कर कँधा आगे कर देंगे कि वो भी सर रख कर इस दर्द भरी घड़ी में हल्की हो ले. इन्सानयित का तकाज़ा तो यही कहता है और इसमें अपना जाता भी क्या है. कँधा कोई शक्कर का तो है नहीं कि उस दुखिया के आँसूओं से गल जायेगा.

पता चला कि ब्यूटी पार्लर के लिए निकल गई है फ्यूनरल मेकअप के लिए. भारतीय है तो थोड़ा गहराई नापने की इच्छा हो आई और जरा कुरेदा तो पता चला कि ब्लैक ड्रेस तो तीन दिन पहले ही पसंद कर आई थी आज के लिए और मेकअप करवा कर सीधे ही फ्यूनरल होम चली जायेगी. कफन का बक्सा प्यूर टीक का डिज़ायनर रेन्ज का है फलाना कम्पनी ने बनाया है और गड़ाने की जमीन भी प्राईम लोकेशन है मरघटाई की. अगर इन्विटेशन नहीं है तो आप फ्यूनरल अटेंड नहीं कर सकते हैं मगर अगर चैरिटी के लिए डोनेशन देना है तो ट्रस्ट फण्ड फलाने बैंक में सेट अप कर दिया गया है, वहाँ सीधे डोनेट कर दें एण्ड एक स्पेशल हिदायत, स्वाईन फ्लू के चलते, कृप्या फ्लावर्स न भिजवायें. स्वीकार्य नहीं होंगे.

हम भी अपना मूँह लिए सफेद कुर्ता पजामा वापस बक्से में रख दिए और सोचने लगे कि अगर हमारे भारत में भी ऐसा होता तो भांजे का स्टेटमेन्ट भी लेटेस्ट फैशन के हिसाब से निमंत्रण पत्र में जरुर रहता:

"मेले मामू को छनिवाल को फूँका जायेगा. आप जलूल आना....चोनू"

सोमवार, जून 15, 2009

गज़ल मुझसे रुठी है..

पिछले तीन हफ्तों से हर हफ्ते तीन चार दिन बाहर जाना हो रहा है. मौका ही नहीं लग पा रहा है कि ब्लॉगजगत की बहुत सुध ली जाये मगर फिर भी प्रयास जारी है. अगला हफ्ता फिर व्यस्त है. उसके बाद शायद कुछ राहत हो. अभी दो हफ्ते पहले कैलिफोर्निया यात्रा के दौरान इन प्यारे तोताराम जी से मुलाकात हुई और कुछ बात हुई.

तोताराम

कैद!!


कुछ सोच की
आसमानी सरहदें..
कुछ अनुभव के
नुकीले किनारे..

कुछ सामाजिक मर्यादाओं की
चहारदीवारियाँ..
कुछ कुटुम्बीय मान्यताऐं
मानिंद खेत की मेढ़ें..

कुछ व्यक्तिगत व्यवहारजनित
मान्यताऐं..

इन सबके भीतर
सिमटता हुआ
इक
मेरा जहाँ..

और

मैं

उस जहाँ को सोचता हूँ!!

-कैद में कौन कब खुश रहा है?






अहमियत!!


उपर से चौथी पंक्ति में
बायें से तीसरा शब्द
दायें से गिनों
तो पाँचवां
और नीचे से हिसाब लगायें
तो
सातवीं पंक्ति..

ये वो जगह है
जहाँ बहर टूटी है
और
गज़ल मुझसे रुठी है..

कितनी अहमियत है
हर स्थल की!!!


-समीर लाल 'समीर'



एक जरुरी सूचना: मेरी पुस्तक ’बिखरे मोती’ जीतने का सुनहरा मौका

आप कविता लिखते हैं और हिन्दी ब्लॉगरों के बीच ख़ास मुकाम बनाना चाहते हैं? आप कविता के अच्छे पाठक हैं, कविताओं की समालोचना में यक़ीन रखते हैं। तो हिन्द-युग्म की यूनिकवि एवं यूनिपाठक प्रतियोगिता के जून 2009 अंक में भाग लीजिए और उपहार स्वरूप ले जाइए मेरी नवीनतम प्रकाशित कविता-संग्रह 'बिखरे मोती' की एक प्रति। अंतिम तिथि- 15 जून 2009। अधिक जानकारी के लिए यहाँ देखें।