आज शाम से ही तेज आँधी चल रही थी. वह अपने कमरे की खिड़की से बैठा सामने लगे ऊँचे ऊँचे देवदार के पेड़ों को हवा के साथ बार बार झुकता और हवा कम हो जाने पर सीधा ख़ड़े होते देख रोमांचित हो रहा था. वह देख रहा था कि तेज अंधड़ न जाने कितने वृक्षों को जड़ से उखाड़ फैंका और अपने साथ ले उड़ा. हवा की सांय सांय की आवाज में उन वृक्षों की चरमराहट, टूटने की आवाजें सब दब कर रह जा रही थीं.
एकाएक उसे याद आया कि ऐसी ही एक आँधी, पलायन की आँधी, विकल्पहीनता के गर्भ से उठी बेहतर विकल्प की दिशा में बहती आँधी, जिसका मुकाबला करते जाने कितनी बार झुक कर वह सीधा खड़ा हो गया था किन्तु एक तेज झोके के साथ वह जड़ से उखड़ आ पड़ा था सात समुन्दर पार अमरीका में.
नये माहौल का उत्साह, बेहतर सुविधाओं की चमक दमक, अंतहीन विकल्प और जल्द ही वह आदी हो गया इन सब का. जड़ों से छूट जाने क दर्द यहाँ की तड़क भड़क की तेज रफ्तार भागती जिन्दगी में गुम होकर रह गया ठीक वैसे ही जैसे उसकी अपनी पहचान.
कभी खाली वक्त में वह जड़ों को याद भी करता, फोन लगता उनसे संपर्क स्थापित करने की कोशिश में ध्वनि तरंगों के माध्यम से किन्तु ध्वनि तरंगो में वह जुड़ाव कहाँ कि कुछ भी जुड़ सके. न स्पर्श और न गंध. शीघ्र ही वायुमंडल में वह विलुप्त हो जाती और जीवन फिर अपने उसी ढ़र्रे पर चल निकलता.
शादी हुई, बच्चे हुए. व्यस्तताऐं ऐसी कि सुरसा सा मूँह बाये बढ़ती ही गईं. माँ नहीं रहीं. हफ्ते भर को जड़ों तक जा अपना कर्तव्य पूरा कर फिर लौट आया. जल्द ही खबर आई कि पिता जी भी नहीं रहे. एक बार फिर वही कर्तव्य निर्वहन और वापसी. अब तो कोई और वजह भी न बची कि वह लौट सके.
समय गतिमान है और उसकी अपनी गति होती है. न तो वह आपका इन्तजार करता है और न ही वापस लौटता है. विजयी वह जो उसकी गति से अपनी गति मिला ले. न मिला पाये तो पराजित. माँ ने बताई थी कभी बचपन में यह बात उसे.
आज जब वह घर से निकल कर हाईवे में अपनी गाड़ी उतारता है तो हाई वे मिलाने वाली सड़क पर उसे अपनी गाड़ी की गति बढ़ाते बढ़ाते १०० के आसपास ले जाना होती है, तभी हाईवे पर तेज रफ्तार कारों के काफिले में वो शामिल हो पाता है. जब भी वह ऐसा करता है उसे माँ का बताया मंत्र समय का याद हो उठता है और माँ की याद जहन में आ जाती है. उस याद को सर झटक कर अलग करने का गुर भी वह इसी समय के साथ साथ सीख गया है और चल पड़ता है दफ्तर की ओर, एक नये दिन की नई शुरुवात करने.
बच्चे बड़े हुए. अपने अपने काम काजों से लग गये और एक बार फिर वही, अब बच्चे घर से दूर अपने लिए बेहतर विकल्प तलाशते. आश्चर्य होता है सदियों से ऐसा देख कर कि बेहतर विकल्प घर से दूर ही होते हैं अक्सर, न जाने क्यूँ. किस बात के लिए बेहतर विकल्प- क्या रोजगार के लिए, स्वतंत्र जिन्दगी के लिए, नया कुछ जानने के लिए कि बस, एक नया रोमांच.
अब वह खाली रहने लगा, न पहले की तरह काम करने की आवश्यक्ता रही और न ही तन में उतनी शक्ति. खाली मन स्वभावतः यादों की वादियों में टहलने का आदी होता है..तब वह कोई अजूबा नहीं. एक साधरण मानव ही तो है.
आज इस आँधी ने उसे बचपन के उस गाँव पहुँचा दिया, जहाँ उसने माँ की ऊँगली पकड़ कर चलना सीखा था. अपने पिता के विशाल व्यक्तित्व को अपना नायक माना था. पिता जी स्कूल में मास्टर थे और हृदय से कोमल होने के बावजूद अनुशासन के मामले में बेहद सख्त. पूरे गाँव के बच्चे उनसे डरा करते थे.
पिछले बरस, जब वह रिटायर हुआ तो उसके विभाग ने उसके इतने वर्षों के सेवाकाल के प्रसन्न हो उसे एक विदाई समारोह में प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया. आज वह प्रशस्ति पत्र ठीक इसी खि़ड़की के उपर फ्रेम में जड़ा टंगा है मगर अब जब वह याद करता है कि बचपन में उसे स्कूल की वाद विवाद प्रतियोगिता में जीत के लिए सरपंच महोदय के हाथों एक कप प्रदान कर सम्मानित किया गया था तो यह खुशी उस खुशी के सामने एकदम फीकी नजर आती है. पिताजी कितने खुश थे और स्टेज पर उठकर उन्होंने उससे हाथ मिला कर गले लगाया था. फिर शाम चन्दु हलवाई के यहाँ से रबड़ी लेकर आ गये थे.
एक बार दीवाली पर दादा जी ने उसे बाजार से सफेद धोती कुरता दिलवाया था. तब वह तैयार होकर हाथ में छड़ी ल्रेकर पिता जी बन गया था. पिता जी ने फोटोग्राफर मोहन चाचा को बुलवाकर अपनी गोद में बैठाकर उसकी तस्वीर खिंचवाई थी. अब न जाने वह तस्वीर भी कहाँ होगी. होती तो आज एक बार उसे फिर जरुर देखता. शायद गाँव में हो मगर कहाँ.
कहते हैं कि गाँव में कोई देखने वाला बचा नहीं. मकान ढह गया और फिर वहाँ कुछ दुकानें खुल गई. उस जमाने में तो कोई कागज पत्तर भी नहीं होते थे. होते तो भी अब तक कौन सहेजता जब वह खुद ही कभी वापस नहीं गया. शायद उसी मकान के मलबे के साथ फैक दी गई होंगी वह तस्वीरें भी और वह कप भी.
याद आते हैं वह खेत जहाँ अपने दादा के कँधों पर बैठकर वह रोज जाया करता था और वह दोस्त किश्नु और जगतारा, जिनके साथ वह स्कूल में पढ़ा और दोपहर भर खेला करता था. उसे याद आया कि एक बार किश्नु और जगतारा के साथ वह बिना किसी को बताये तालाब पर तैरने चला गया था और किश्नु डूबने लग गया था. तब उसने कितनी जोर जोर से हल्ला मचा कर सबको इक्कठा किया था और किश्नु को सबने बचा कर निकाल लिया था.
उस शाम तीनों को अपने अपने घर में खूब मार पड़ी थी. तब वह सुबकता हुआ अम्मा के पास दुबक गया था. अम्मा ने गरम दूध करके उसमें रोटी शक्कर डाल कर अपने हाथ से खिलाया था और फिर गरम पानी से उसकी सिकाई करती रही और वह सुबकते सुबकते सो गया था.
आज याद करते करते एकाएक उसका हाथ कंधे पर चला गया जहाँ उस रात सबसे ज्यादा दर्द था. एकाएक माँ का सिंकाई करना याद आया. आँखें नम हो गईं. मगर अब क्या, अब तो बस वह यादें ही शेष हैं और उन्हीं यादों की वादियों में माँ के स्पर्श का एहसास. कितनी देर कर दी उसने. अब गणित लगाने से भी क्या फायदा देर जल्दी का, क्या पाया क्या खोया का.
सोचता है तो लगता है क्या यही बेहतर विकल्प होता है जिसको पाने के लिए इन्सान अपना सर्वस्व खोता है.नहीं, शायद नहीं. यह तो शायद उम्र की उमंग होती है जो दूरदृष्टि के आभाव में यह समझ ही नहीं पाती कि क्या होता है वाकई बेहतर विकल्प और जब तक यह बात समझ आ पाती है, वापसी के सारे द्वार बंद हो चुके होते हैं और बच रहता है बस एक और एक मात्र विकल्प!! खिड़की पर बैठे नम आँखों से यादों की वादियों में विचरण!!!
आसमानी रिश्ते भी टूट जाते हैं..
बारिश यूँ ही बेवजह नहीं होती...
-आज फिर मेरी आँख बरसी है.
-समीर लाल ’समीर’