बुधवार, मई 14, 2008

सहायता चाहिये पर सहायताओं से गुरेज

सहायता (ऐड) चाहिये पर सहायताओं (ऐड्स) से गुरेज, हद है!

बचपन में घर पर एक कहावत सुना करते थे-इतना ज्यादा मिठाई भी मत खा लो कि मीठा कड़वा लगने लगे.

अब देखिये न, एक जमाने में अमेरीका का खास आदमी. सहायता(Aid) पर सहायता(Aid) मांगे और जब यही बात बढ़ी तो ऐड्स -AIDS (सहायता का बहुवचन सहायताओं का अंग्रेजी) से डर गया. उस जमाने में तो जो मांगा सब मिला. डालर पर डालर. मिसाईल पर मिसाईल और WMD (वेपन ऑफ मास डिस्ट्रक्शन). खूब ईरान पर हमला किया. बड़े भईया जी अमरीका से सपोर्ट का टेका लगाये रहे. जो मर्जी आई, करते रहे. धाँये..धाँये खूब बम दागे, क्यूँ?

फिर बड़े भईया की नजर तेल के कुंए पर पड़ गई. अब लो, वो तेल तो उनको चाहिये. बस, नाराज हो लिए. कुवैत से दोस्ती गढ़ ली. वो बन गये नये पिट्ठू और तुम अपने मूँह मियाँ मिट्ठू. इसीलिए बुजुर्ग, पठानों और गुण्डों से उधार और मदद लेने से मना करते थे कि कब न बात उलट जाये. ये किसी के सगे नहीं होते. इन्हें तो बस अपना वर्चस्व फैलाना होता है, उसी ध्येय से मदद करते हैं और इसीलिए उधार भी देते हैं कि न लौटा पाओ और उनकी गुलामी करो. मगर सद्दाम ने कब बुजुर्गों की सलाह मानी. जो मन में आया-किया. लो, फिर भुगता न!! यही तो है, जब खुद बुजुर्ग हो लेते हो, तब बुजुर्गों की सलाह याद आती है. मगर, तब तक तो देर हो चुकी होती है. बस, पछतावा रह जाता है.

सब राज पाट छिन गया और चूहे के बिल से पकड़ाये. जेल और फिर फाँसी.

भारत होता तो हमारे राष्ट्रपति जी माफ भी कर देते तुम्हारी फाँसी. पूरी योग्यता तो थी-एक तो मुसलमान और उपर से डिक्लेयर्ड आतंकी. फिर कैसे न माफ होती? बस एक कमीं थी कि तुमने भारतियों को नहीं मारा फिर भी चलेगा. इतनी नन्हीं बात पर भारत ध्यान नहीं देता या यूँ कहें कि ध्यान नहीं जाता. और बड़े बड़े मुद्दे पड़े हैं सोचने को.

मगर बाबू, वो अमरीका है, यूँ ही नहीं माफी मिलती. समझे!!

Saddam

कल सद्दाम की डायरी के पन्ने पढ़ता था. मात्र ६ या ७ पन्ने रिलिज किये हैं अमरीका ने और हमने उसमें से मात्र ३ लाईनें पढ़ी.

सद्दाम कहते हैं कि मुझे जेल में इस बात का डर लगता है कि मुझे कहीं ऐड्स न हो जाये.

(हम्म!! क्यूँ भाई, ऐसा क्या इन्तजाम हो लिया जेल में कि ऐड्स का खतरा मंडराने लगा. बोलो, बोलो!! कहीं वो फाँसी को स्टेजड ड्रामा बताने वाली बात सच तो नहीं कि तुम्हारी फाँसी हुई न हो, किसी और को टांग दिया और तुम अमरीका की मेहमानी काट रहे हो अपने पुराने संबंधों के चलते और फिर अमरीकी मेहमानी वो भी शासकीय-ऐड्स का खतरा तो स्वाभाविक है और डर भी. मगर तुम किस बात से डरे?? ऐड्स से मरने से?? मरने से तुम डरो, यह मानने को दिल नहीं मानता. जो आदमी बिना मूँह ढ़कवाये खुली आँख फाँसी का फंदा गले में डलवा के झूल गया हो, वो मरने से डरे?? ह्म्म. कौन मानेगा?? फिर ऐड्स से कैसा डर? तुम्हें तो यूँ भी फाँसी घोषित हो ही चुकी थी. मरना तो है ही ऐसे भी और वैसे भी, फिर डर कैसा?? न न!! कोई और बात है..आगे पढ़ता हूँ.)

आगे लिखते हैं कि मैने कई बार इन अमरीकी जवानों को मना किया कि तुम अपने कपड़े उस डोरी पर मत सुखाया करो जहाँ मेरे कपड़े सूखते हैं. तुम जवान हो, तुम्हें जवानों वाली बीमारी होगी. तुम्हारे इस तरह सेम डोरी पर कपड़े सुखाने से मुझे भी ऐड्स हो सकती है, मगर मानते ही नहीं.

(हा हा!! वो क्या, कोई भी नहीं मानेगा कि डोरी से ऐड्स हो गया सद्दाम साहब को. मगर भाई, बहाना सालिड खोजा है. बहुत खूब. साधुवाद ऐसी सोच को. मान गये. धोबी या धोबन से ऐड्स लग गया तो समझ में आता है, है तो वो भी बदनामी की वजह, मगर कपड़े सुखाने वाली डोरी से ऐड्स-गजब भाई गजब!!! एक चीज तो सही सोची कि अमरीकी जवान सैनिकों पर बात सरका दो. वो सही है. एक तो अमरीकी, फिर जवान, फिर सेना मे और उन सब के उपर-ईराक में पोस्टेड- स्वाभाविक सी बात है-ऐसी बीमारी उन्हें पकड़ ले-मगर उनके कपड़े जिस डोरी पर सूखें उससे तुम्हें पकड़ ले ऐड्स तब तो गजब ही हो लिया. कौन मानेगा-हर जगह थू थू कि लो इस बुढ़ापे में न जाने क्या कर डाला कि ऐडस ने पकड़ लिया. हम तो खैर भारत से हैं जहाँ तुम्हारी उम्र के लोग तो अगर गलत नजर से लड़की को देख भर लें तो पूरा मोहल्ला थूके कि छी छी, कम से कम उम्र का तो ख्याल किया होता. ऐडस को तो कोई न टॉलरेट करे इस उम्र में.पूरे मोहल्ले में पिटते घूमते!!)

सही है गुरु, सही बहाना निकालने की कोशिश की है. नतमस्तक हैं तुम्हारी सोच पर. दिमाग के तो तेज हो, तभी तो इतने समय अड़े रहे. हमें तो डाऊट है कि तुम अमरीकी मेहमानी अब भी काट रहे हो और वो फाँसी पर तुम्हारा डुप्लीकेट लटक लिया है. डाऊट बस है, सच तो तुम, तुम्हारे बड़े भईया अमरीका वाले मौसेरे भाई और तुम्हारा खुदा जाने!!! यह भी हो सकता है कि अमरीका ने तुम्हें मारने से पहले, जैसे बकरे को हलाल करने के पहले खूब खिलाते पिलाते हैं, तुम्हारी मेहमान नवाजी तबीयत से की हो और तुम बाद में घबरा गये हो कि कहीं मरने से पहले ऐड्स वाली बदनामी न हो जाये तो यह सब डायरी में लिख गये हो.

क्या सच-क्या झूठ. हमें तो पता नहीं. हम तो सिर्फ सोच और लिख सकते हैं और मुशर्रफ जी को सलाह दे सकते हैं कि संभल जाओ या फिर एक डायरी खरीद कर लिखने की प्रेक्टिस करो ताकि उस वक्त बहाना सही बन पड़े.

अगर इत्ते बड़े गुंडों से सहायता (ऐड) ले रहे हो तो सहायताओं(ऐड्स) से गुरेज न करना!!! वैसे अमरीका में पैकेज डील का प्रचलन है-ऐड के साथ ऐड्स भी-पैकेज डील ही कहलाई.

बता दे रहे हैं ताकि बाद में न कहना कि बताया नहीं.


नोट: अगर कहीं सच में जिन्दा हुआ तो हमारा तो यह आखिरी आलेख ही समझो. छोड़ेगा थोड़ी गुगल ट्रांसलेटर से पढ़कर. क्या चीज बनाई है हिन्दी से अंग्रेजी या कितनी ही भाषाओं से कितनी ही भाषाओं में ट्रांसलेट कर पढ़ने के लिए.

सोमवार, मई 12, 2008

टेन्ट हाऊस वाले को नमन

आज तक आपने मंचों से कवियों को आयोजकों, श्रोताओं, विज्ञापनदाताओं यदि कोई मैग्जीन भी छपी हो तो और मंचासीन साथी कवियों का आभार करते ही सुना होगा. आज हमारा उनके लिए आभार सुनिये जो सही में बधाई के पात्र हैं वरना तो सब फेल हैं. मैं तो उनके प्रति नत मस्तक हूँ. वरना तो मूँह के बल जमीन पर गिरे पड़े मिलते. :) उनके योगदान पर अपना आभार पेश कर रहा हूँ:


टेन्ट हाऊस वाले को नमन


हमको जिसने मंच दिया है
उसके हम आभारी हैं....
देखो अब तक टिका हुआ है
जबकि कितने भारी हैं...


टेन्ट हाऊस को काम दिया है
आयोजक बतलाते हैं...
मोटे इतने कील लगाते कि
मंत्री भी चढ़ जाते हैं...
मंच सजाने में उनसे कोई
अब तक जीत नहीं पाया
जान गये थे फोटो से ही
कैसी अपनी है काया....

धन्यवाद मैं उन्हें सौंपता
असल वही अधिकारी हैं...
हमको जिसने मंच दिया है
उसके हम आभारी हैं....


हम गिर जायें उससे हमको
क्या कुछ होने वाला है
नीचे जो भी दब जायेगा
जीवन खोने वाला है...
ऊँचे दर्जे की कविता फिर
दफन यहीं हो जायेगी....
मिट्टी की बातें ये सारी
मिट्टी में खो जायेंगी...

बचा हुआ है मंच तभी तक
इनकी बातें जारी हैं..
हमको जिसने मंच दिया है
उसके हम आभारी हैं....

एक राज की बात बांटता
देश के रचनाकारों से..
कभी उऋण न हो पाओगे
टे्न्टीय इन उपकारों से...
मंच से लेकर माईक दरी तक
सब अहसान इन्हीं का है
अंतिम बैठा वो श्रोता भी
खादिम राम इन्हीं का है

माईक खोल कर ही जायेगा
सब उसकी जिम्मेदारी हैं....
हमको जिसने मंच दिया है
उसके हम आभारी हैं....


अब तक ये जो बात किसी की
नजर में न चढ़ पाई है
हम जैसे दृष्टा ने आकर
तुमको आज बताई है...
अब चलते चलते एक निवेदन
मेरा यह स्वीकार करो..
ताली दो इनके कामों को
मेरा भी उद्धार करो...


क्या क्या बात बतायें तुमको
बातें कितनी सारी हैं...
हमको जिसने मंच दिया है
उसके हम आभारी हैं....


-समीर लाल ’समीर’

शुक्रवार, मई 09, 2008

मेरी कामना!!

Pipe copy

मेरा घर

उस बड़े से पाईप के अंदर

जो सामने ओवर ब्रिज के नीचे लगना था

आज उजड़ गया....

ब्रिज बन कर तैयार हो गया

शहर के विकास का जीता जागता प्रमाण

और मैं और मेरा परिवार

नये घर की तलाश में हूँ....

यह शहर विकसित होता रहे...

बस, कभी विकसित न हो..

नये पाईप गिरें..

मुझे नया घरोंदा मिले...

यही कामना है-


--समीर लाल ’समीर’

(विकासशील मानसिकता भी विकसित होने में बाधक है शायद?
देश/ शहर बस विकसित होता रहे-हमारे नेता भी तो यही चाहते हैं यह एक क्रिया ही बनी रहे, संज्ञा न बन पाये)

बुधवार, मई 07, 2008

गमछे की लपेट में

जिस दिन से कनाडा वापस आया हूँ, न जाने आँखे हर तरफ बस एक ही चीज खोज रही हैं-गमछा. बड़ा मिस कर रहा हूँ गमछे को.

गमछा मिस कर रहा हूँ इसलिये नहीं कि मैं पूरबिया भईया गमछा लपेटे नहाता होऊँगा या कंधे पर गमछा डाले खैनी दबाये गली गली डोलता होऊँगा बल्कि इसलिये कि इतने दिन भारत में रहे- जहाँ देखो वहीं गमछा. सफेद-और दूसरी वाली का उससे भी सफेद. क्योंकि शायद सर्फ से धुला होगा. अगर सर्फ का वो वाला विज्ञापन आज बने तो पंच लाईन होगी- भला उसका गमछा मेरे गमछे से ज्यादा सफेद कैसे.

जबलपुर में हर लड़की/ महिला जो भी सड़क पर दिख जाये वो ही चेहरे पर गमछा लपेटे, हाथों में कोहनी तक ढ़के दस्ताने पहने, सर पर टोपी, आँख पर काला चश्मा और एक डॉक्टरनुमा एप्रन पहने मिलेगी.

कल तो इतना मिस किया कि मैं गाने ही लगा-"हवा में उड़ता जाये, ये उजला गमछा मैडम का!!!

सुना था महिलाओं में एक दूसरे से ज्यादा खूबसूरत दिखने की एक इनबिल्ट होड़ की प्रवृति होती है. सुना ही क्या, महसूस भी किया है. मगर इस वेशभूषा में तो सभी एक सी दिखती हैं. रोड रोमियोज यानि सड़क छाप मनचलों की तो मानो दुकान ही बन्द हो गई. जेबकटी शाहर में एकाएक बढ़ गई. कारण पता किये तो मालूम चला कि छुट्ट्न भाई लोगों के पास कोई काम बचा नहीं तो जेबें काटा करतें हैं. बेचारों पर बड़ी दया सी आती है. कैसे छेड़ें, किसको छेड़े?

bhopal

पता चले कि किसी को छेड़ दिया तो गमछा हटने पर अन्दर से ५५ वर्षीय माता जी नुमा महिला अवतरीत हो गईं या खुद ही की कोई परिचिता निकल आईं. बीबी निकल आये तब तो राम नाम सत्य ही समझो. कौन रिस्क लेगा भला ऐसे में.

छेड़ो भी, पिटो भी और अन्दर से निकली खब्बड़ कल्लो. कितनी तो जग हँसाई हो जाये.

एक दिन तो गज़ब ही हो गया. बैंक के बाहर खड़ा था. एक सुडोल (इसके अलावा तो कुछ भी दृष्टीगत नहीं था) कन्या ने आकर स्कूटी रोकी तो हावभाव देख बरबस ही नजर ठहर गई. फिर उसने अपने गमछा उतारा तो अन्दर से लड़का निकला. अब सोचिये, अगर कोई उसे छेड़ लेता तो कितना पंगा खड़ा हो जाता.

आजकल तो अगर कोई छेड़ाछाड़ी कर्म में लिप्त मिले तो जान लिजिये पक्का जुआड़ी है और ब्लाईन्ड खेलने का शौकिन.

मैं अपने आपसे प्रश्न करता रहा कि आखिर ऐसा क्या है जो एकाएक सब महिला वर्ग इतना लैस होकर सड़क पर निकलने लगा है. सुना था कि अब तो शहर की स्थितियाँ पहले से बहुत बेहतर हैं. पुलिस मुस्तैद हो गई है और अपराध भी कम हो गये हैं. प्रश्न अनुत्तरित ही बना रहा तब हार कर मैने एक महिला मित्र की शरण ली. मैने उन्हें अपनी जिज्ञासा से अवगत कराया तो वह खूब हँसीं.

कहती हैं कि आजकल भारतीय महिलाऐं अपनी ब्यूटी के प्रति बहुत जागरुक हो गई हैं. स्किन डेमेज न हो और सॉफ्ट एण्ड ग्लोयी बनी रहे, इसलिये सब इसे ढंक कर निकलती हैं.

मैने कहा , "और ये कैप?"

"इससे बालों की चमक बनी रहती है!" उन्होंने मेरी जिज्ञासा शांत करते हुए बताया.

मैं उनको धन्यवाद कर चला तो आया मगर सोचता रहा कि लाख ग्लोयी तव्चा बनी रहे, बाल चमकते रहें-फायदा क्या?? जब कोई उन्हें देख ही नहीं रहा. घर वाले देखें भी तो क्या? घर वालों को तो घर वाले जैसे भी हों यूँ भी प्यारे रहते हैं. हम खुद अपने कई घर वालों के रोल मॉडल हैं. उनके लिये सुन्दरता के मापदण्ड आपकी स्किन की सॉफ्टनेस, ग्लो और बालों की चमक का कोई मायने नहीं. यह सब तो बाहर वालों के लिये हैं और उस समय आप नख से शिख तक पूरा नकाबमयी हो लेती हैं तो सब बेकार गया. फिर कहते हैं हम वेस्टनाईज हो रहे हैं.

इस वेस्टन वर्ड में तो मैने किसी को गमछा लपेटते नहीं देखा. बल्कि हमारे यहाँ से उल्टा-जैसे जैसे गरमी बढ़ती है, वैसे वैसे कपड़े छोटे और कम. सरदी का अंतिम पड़ाव में तो जिम लड़कियों से भर जाते हैं. सब गरमी की तैयारी में वापस शेप में आ जाती हैं. सरदी में तो मोटे मोटे कपड़े के अन्दर कौन मोटा कौन पतला-पता ही नहीं लगता.

२४-२५ डिग्री पर तो शार्टस/ स्लिवलेस बनियान में आने लगते हैं सड़को पर. कपड़ो की साईज और संख्या गरमी के तापमान के वक्रानुपाती.

जिसकी जैसी स्किन, ग्लो या नो ग्लो, जैसे बाल, जितनी सुन्दर, कम सुन्दर-सब सामने. कुछ भी गमछे में लिपटा नहीं.

कभी सोचता हूँ कि यहाँ सड़कें कैसी दिखेंगी अगर तापमान दिल्ली वाला पहुँच जाये यहाँ ४५ डिग्री. सड़कें समुद्री बीच बन जायेंगी शायद और हमारा घर बीच फेसिंग.

चलो, अभी तो शौकिया खुद की इच्छा से यह महिलायें पर्दा किये हैं मगर शायद यही अगर मजबूरी में करना होता तो कितनी ही आवाजें उठ खड़ी होती कि महिलाओं को प्रताड़ित किया जा रहा है. पर्दा प्रथा नहीं चलेगी और यह सब आवाजें आती भी महिला खेमे से ही. वैसे, अगर मजबूरी होती तो आना भी चाहिये. :)

खैर, अब स्किन और हेयर का तो जो हो सो हो मगर नव युवाओं को यह खुले आम सड़क के किनारे, थियेटर या रेस्टॉरेन्ट में मिलने जुलने के बहुत अवसर उपलब्ध करा रहा है. पहले एक डर रहा करता था कि कहीं कोई पहचान का न देख ले. अब गमछा अपने अन्दर वो डर भी समेट ले गया. लोग गमछा लपेटे खुले आम मिल रहे हैं. बेहूदी हरकतें सड़क के किनारे खुले आम दिखना एक आम सी बात हो गई है.

बड़ा विशाल है- कभी सुन्दरता अपने अन्दर लपेट लेता है तो कभी डर और कभी हया !!!

धन्य है गमछा महिमा!!

सोमवार, मई 05, 2008

कैसे कैसे पूर्वाग्रह!!

जनवरी माह की ठंड की रात के ११ तो बज ही गये होंगे. सड़क बिल्कुल सुनसान.

एक पार्टी से लौटते हुए घर के अंधेरे मोड़ पर गाड़ी मोड़ी तो देखा एक आदमी स्कूटर से गिरा पड़ा है. गाड़ी खड़ी करके नजदीक जाकर देखा तो लगा कि मर चुका है.

तुरंत वहीं से पुलिस को फोन किया.

४५ मिनट में ही तत्परता से पुलिस आ गई. जीप से उतरते ही इन्सपेक्टर ने पहले लुढ़की हुई स्कूटर और फिर उस व्यक्ति पर नजर दौड़ाई और फिर अपने सिपाही से बोला: इस गाड़ी वाले ने ही ठोका होगा. ले चलो साले को थाने. सब रात में दारु पी कर चलाते हैं और एक सीधे सादे स्कूटर चालक को मार दिया. ले चलो, अभी उतारते हैं इनकी रईसी!!

आवाज पहचानी हुई थी फिर भी एक बार को तो मैं घबराया कि यह कौन सी बला मोल ले ली. एक बार को आँख के सामने पुलिस के डंडे खाते का दृष्य भी घूम गया.

मैने ध्यान से देखा तो मेरा पूर्व से जानने वाला ही इन्सपेक्टर था.

मैने हिम्मत जुटा कर कहा- अरे तिवारी जी, आप??

वो भी पुलिसिया मिजाज के विपरीत झट से पहचान गये: अरे भाई साहब, आप यहाँ क्या कर रहे हैं?

मैने उन्हे स्थितियाँ बतलाई कि कैसे मैं दावत से लौट रहा था और यह यहाँ पडा मिला तो मैने पुलिस को फोन किया.

उसने तुरंत सिपाही से कहा: देख तो रे, ये मर गया कि जिंदा है?

फिर मेरी तरफ मुखातिब होते हुए कहने लगा: क्या बतायें भाई साहब, ये लोग भी न! बस, पी कर स्कूटर चलाते हैं. होश रहता नहीं, कहीं भी पत्थर/ खम्बे से टकराये और लगे मरने और परेशान होते हैं आप जैसे सीधे सादे लोग.

क्या बदलाव आया एक मिनट में पहचान के कारण.

सिपाही उस बेहोश आदमी के पेट में डंडा कोंच कर पूछ रहा है कि क्यूँ बे, जिन्दा है कि मर गया?

डंडे की कूचन से वो थोड़ा हिला डुला फिर क्या था! सिपाही ने उसे दो डंडे ही जड़ दिये-देख कर नहीं चलता क्या? पीकर गाड़ी चलाता है?

मैने बीच में पड़ते हुए कहा कि यार, वो मर जायेगा. इसे अस्पताल भिजवाओ.

इन्सपेक्टर ने बताया कि ये ऐसे नहीं मरते. अभी इसको थाने ले जायेंगे. एफ आई आर बनेगी. फिर अस्पताल भेजेंगे.
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खैर, जीप में उसे और उसके स्कूटर को लदवाया गया. तिवारी जी अगले दिन शाम को दावत पर मिलने का वादा लेकर विदा हो गये.

मैं भौचक्का सा सोचता रहा कि अगर आज तिवारी जी की जगह कोई और इन्सपेक्टर होता तो?? मैं तो अभी पिट रहा होता थाने में और जो दारुखोरी और बेहोशी का इल्जाम उस दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति पर लगा है वो मैं झेल रहा होता.

सोचता हूँ कि यह कैसा पूर्वाग्रह है कि बिना किसी पड़ताल के अपनी तरफ से ही पूरी कहानी बना ली. अब जैसे जैसे पड़ताल और पहचान (लेन-देन शिष्टाचार भी इसी का अंग है) आगे निगलेगी, वैसा दिशा निर्धारण होगा केस का.

खैर, अब मैं भी एक पूर्वाग्रह से ग्रसित सा लग रहा हूँ. आईंदा जब भी ऐसा मौका आयेगा, मैं भी अन्यों की तरह अनदेखा कर के निकल लूँ तो ही ठीक.

पता नहीं जब वक्त आयेगा तब यह पूर्वाग्रह हाबी हो पायेगा या नहीं मगर अभी तो मुझे ग्रसित किये हुए है.

वादे क मुताबिक अगले दिन तिवारी जी के साथ कुछ जाम शाम छलके. वो बता रहे थे कि सुबह अस्पताल से पट्टी वगैरह करा कर उसकी छुट्टी करा दी है. स्कूटर जब्त है. घटना की तफतीश चल रही है. शराब पीकर वाहन चलाने का आरोप है. कुछ तो रकम कटेगी.

नशे में कह रहे थे कि पता नहीं लोग क्यूँ पीते हैं और उस पर से गाड़ी चलाते हैं. बहुत गुस्सा आता है मुझे ऐसे लोगों पर.

हम सुनते रहे. हाँ में हाँ मिलाते रहे. रात ज्यादा होने लगी. तब तक तिवारी जी पी भी काफी चुके थे सो हम विदा हुए. तिवारी जी अपनी बुलेट पर झूमते हुए निकल गये अपने घर और हम आ गये अपने घर.

शुक्रवार, मई 02, 2008

विरह रो रहा है, मिलन गा रहा है

जबलपुर से निकले हफ्ता होने आया मगर वहाँ बिताये पल यादों में ऐसे रचे बसे हैं कि अब तक यहाँ सेट ही नहीं हो पा रहे है.

बहुत भारी मन से आज अपनी हाथ घड़ी में भारत का समय बदल कर कनाडा का किया तब लगा कि वाकई, फिर से बहुत दूर आ गये हैं. हालाँकि मौसम याद दिलाता है दिन भर और रात भर. आज सुबह भी ३ फिर दिन में ११ और शाम को ५ तापमान था.

आज जब शाम को टहलने निकला तो जैकेट पहनते बड़ा असहज महसूस हो रहा था. कहाँ सफेद झकाझक कलफी मगहर का सफेद खादी का कुर्ता पहनते ६ माह बीत गये और आज फिर अटक गये शर्ट पैण्ट और जैकेट, मफलर में.

आज से तो सोना/ जागना भी यहाँ के समयानुसार शुरु करना पड़ेगा तभी सोमवार से दफ्तर जाना संभव हो पायेगा.

खैर, यह तो होना ही था. करेंगे जब तक यहाँ है.

हाँ, इस बार होली मिलन पर जबलपुर में एक दावत रखी मित्रों के लिये. उसमें एक कव्वाली का कार्यक्रम भी रखा था. किन्हीं वजहों से उसकी रिकार्डिंग ठीक से नहीं हो पाई. जबलपुर के विख्यात कव्वाल लुकमान चाचा जिनके विषय में विस्तार से पंकज स्वामी ’गुलुश’ ने जबलपुर चौपाल पर लिखा था, के वारिस एवं मेरे परम मित्र श्री सुशांत दुबे ’बवाल’ ने पूरे चार घंटे समा बनाये रखा. १०० से अधिक उपस्थित लोग एकांगी बैठे उन्हें मन लगाये सुनते रहे, पीते रहे, झूमते रहे और फिर खा पी कर चले गये. वो शाम एक यादगार शाम बन गई. मौके का फायदा उठाया गया. बवाल को बीच कार्यक्रम में आराम देने के बहाने दो तीन कविताऐं ठेलने का असीम सुकून प्राप्त किया. मजबूरी में या खूशी से, सबने सुना. वाह वाह की. ताली बजाई. आखिर हमारे बाद बवाल को फिर से सुनना भी तो था. भागते कैसे?

उस दिन की कुछ तस्वीरें बाँट रहा हूँ.

bavaalstage

और

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और

PDR_7639

और

PDR_7647

फिर चलने के एक दिन पहले बवाल को घर पर दावत में बुलाया गया. अकेले समा बना लेने की महारत रखने वाले बवाल नें बिना किसी साज के फिर तीन घंटे सबको अपने गायन से बाधें रखा. बड़े आनन्ददायी क्षण रहे. दो छोटे क्लिपस भी उस बैठक के यहाँ बांटता हूँ. कान में अब तक आवाज गुँज रही है- विरह रो रहा है, मिलन गा रहा है-किसे याद रखूँ, किसे भूल जाऊँ. सच, किस पल को याद रखूँ और किस पल को भूल जाऊँ.




और इसे भी सुनें:



एकदम पहली प्रस्तुति नेट पर. वर्जिन आवाज. आनन्द उठाईये और बताईये ताकि पूरे पूरे आईटम पेश किये जा सकें भविष्य में.

बवाल से काफी चर्चा हुई. उन्होंने भी अपने ब्लॉग का शुभारंभ कर दिया है. अब बात आगे बढ़ेगी-नींव रख दी गई है. जल्द ही आपको उनका और विस्तृत परिचय देता हूँ.

बुधवार, अप्रैल 30, 2008

नेता टिक्का मसाला: यमी यमी यम यम!!

कभी कभी लगने लगता था कि मांसाहारी भोजन करके शायद मैं हिंसा कर रहा हूँ. कोई बहुत बड़ा पाप. आत्म ग्लानि होने लगती है और एक अपराध बोध सा घेर लेता है खासकर तब, जब कि मांसाहार के साथ कुछ जाम भी छलके हों. अपराध बोध भी सोचिये कितना सारा होगा जो हम जैसी काया तक को पूरा घेर लेता है. कहते हैं पी कर आदमी सेंटी हो जाता है. वही होता होगा इस मसले में.
Chicken
तीन चार दिन पहले टीवी पर एक अनोखा समाचार देखा. देखते ही मांसाहारी होने की पूरी ग्लानि और अपराध बोध जाता रहा. उस दिन से निश्चिंत हुआ. अब मुर्गे को कटते देख कोई हीन भावना नहीं आती बल्कि खुशी होती है. वो कौम, जिसकी जिस पर नजर पड़ जाये, उस पूरे गाँव, पूरे शहर, पूरे देश के निरपराध मानवों को मार कर खा गयी हो, उस पर कैसी दया और उस पर कैसा रहम. किस बात की आत्म ग्लानि? अच्छा ही हुआ-जब तुम्हारी कौम में हमको मारने की ताकत आई तो तुमने हमें अपना भोज बनाया और आज हममें ताकत है तो हम तुम्हें खा जायेंगे. खत्म कर देंगे.

टीवी ने बता दिया कि डायनासॉर के पूर्वज मुर्गे थे. टी वी दिन भर ढोल पीटता रहा कि मुर्गे डायनासॉर के बाप थे और उनके पूर्वज थे. टीवी वाले अंधो तक को दिखाकर माने और बहरों को सुना कर हर मसले की तरह.

मुझे तो पहले ही डाउट था कि जरुर कुछ न कुछ बड़ा पंगा किया होगा तभी तो मानव इन्हें खाने पर मजबूर हुआ. अभी बकरे की पोल खुलना बाकी है मगर जान लिजिये, उसकी पंगेबाजी भी जब खुलेगी तो ऐसा ही कुछ सामने आयेगा. पंगेबाजी का अंत तो ऐसा ही होता है चाहे किसी भी स्तर की पंगेबाजी हो. सिर्फ हिन्दी ब्लॉगजगत में पंगेबाजी जायज है और वो भी सिर्फ अरुण अरोरा ’पंगेबाज’ की.
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अब तो शाकाहारियों को देखकर लगता है कि देखो, हम तुम पर कितना अहसान कर रहे हैं. वो मुर्गे जो डायनासॉर बन सकते हैं और तुम्हें और तुम्हारे समाज को पूरी तरह नष्ट कर सकते थे, उन्हें कनवर्जन के पहले ही खत्म करके हम तुम्हें भी बचा रहे हैं. काश, धर्म परिवर्तन जो कि इतना ही खतरनाक कनवर्जन है, के पहले भी ऐसी ही कुछ व्यवस्था हो पाती.

कल ही एक मुर्गा मिल गया था. पूछने लगा कि ऐसी क्या बात है, जो आप जैसी उड़न तश्तरी हमसे इतना नाराज हो गई?

हमने उसे साफ साफ कह दिया कि तुम हमसे बात मत करो, आदमखोर कहिंके. तुम तो वो बने जिसकी जिस पर नजर पड़ जाये, उस पूरे गाँव, पूरे शहर, पूरे देश के निरपराध मानवों को मार कर खा लिया. बर्बाद कर दिया. कहीं का नहीं छोड़ा. तुम पर क्या रहम, तुम्हारा तो यह अंजाम होना ही था.

हमारा खून तो तब से खौला है कि यह डायनासॉर आये कहाँ से, जबसे हमने जोरासिक पार्क फिल्म देखी थी. बस, भरे बैठे थे. जब पता चला कि यह तुम्हारा कनवर्जन हैं, तब से तुमसे नफरत सी हो गई है. मैं तो चाहता हूँ कि तुम्हारा नामो निशान मिट जाये इस धरती से.

मुर्गा मुस्कराया और बोला, " आपका साधुवाद, आप मानव प्रजाति के लिये कितना चिन्तित हैं. मगर हम मुर्गे जैसी ही एक आदमखोर प्रजाति ही तुम्हारी ही शक्ल में तुम्हारे बीच बैठी यही काम कर रही है, उसका क्या करोगे, मिंया. वो भी तो यही कर रहे हैं मगर अपनों के साथ ही कि जिस पर नजर पड़ जाये, उस पूरे गाँव, पूरे शहर, पूरे देश के निरपराध मानवों को मार दें, बर्बाद कर दें. कहीं का नहीं छोड़ें. "

मैं चकराया और पूछने लगा, ’कौन हैं वो?"

मुर्गा हँस रहा है. हा हा हा!! कहता है "तुम्हारे नेता और कौन!!"

बात में दम थी अतः मैं सर झुका कर निकल गया. इस मुर्गे पर न जाने क्यूँ मुझे रहम आ गया. नेता टिक्का मेरे आँखों के सामने तैर जाता है कि अगर उनका भी मुर्गों सा हश्र करने लगे मानव तब??

नेता टिक्का मसाला
neta tikka

फिर पशोपेश मे हूँ कि मांसाहारी बने रहूँ या शाकाहारी हो जाऊँ?