शुक्रवार, नवंबर 20, 2009

कोई मेरी मजबूरी भी तो समझो!!

कल अपनी एक फोटो ऑर्कुट और फेस बुक पर क्या चढ़ा दी कि हल्ला ही मच गया. दन दन कमेंट और ईमेल मय समझाईश कि इतना पीना ठीक नहीं.

drink

अब कैसे समझाऊँ कि भईये, पीना तो हम खुद ही नहीं पसंद करते जब तक की भीषण मजबूरी न हो.

वैसे कई लोगों ने कहा कि इतनी सारी अकेले पियेंगे क्या? अब पहले तो यह जान लें कि एक बंदा तो तस्वीर खींचने वाला है ही जो इसी में से पीने वाला है और तीन फोटो में दायें बायें कट गये हैं और फोटू में फंसे हम अकेले.

वैसे भी साईज के हिसाब से या तो वो तीन ही आ लेते फोटो में या कि हम. उन तीन की फोटो का तो हम क्या करते सो अपनी धरे थे वो ही चिपका दिये.

हाँ, तो हम कह रहे थे कि हमें पीना यूँ तो पसंद नहीं मगर जब मजबूरी आन सामने ही खड़ी हो जाये तो क्या करें??

इन्हीं मजबूरियों को दर्शाते हुए एक रचना लिखी थी ताकि किसी को कन्फ्यूजन न रह जाये, वही फिर से सुना देते हैं ताकि सनद रहे और वक्त पर काम आये:

जब चाँद गगन में होता है
या तारे नभ में छाते हैं
जब मौसम की घुमड़ाई से
बादल भी पसरे जाते हैं
जब मौसम ठंडा होता है
या मुझको गर्मी लगती है
जब बारिश की ठंडी बूंदें
कुछ गीली गीली लगती हैं
तब ऐसे में बेबस होकर
मैं किसी तरह जी लेता हूँ
वैसे तो मुझको पसंद नहीं
बस ऐसे में पी लेता हूँ.

जब मिलन कोई अनोखा हो
या प्यार में मुझको धोखा हो
जब सन्नाटे का राज यहाँ
और कुत्ता कोई भौंका हो
जब साथ सखा कुछ मिल जायें
या एकाकी मन घबराये
जब उत्सव कोई मनता हो
या मातम कहीं भी छा जाये
तब ऐसे में मैं द्रवित हुआ
रो रो कर सिसिकी लेता हूँ
वैसे तो मुझको पसंद नहीं
बस ऐसे में पी लेता हूँ.

जब शोर गुल से सर फटता
या काटे समय नहीं कटता
जब मेरी कविता को सुनकर
खूब दाद उठाता हो श्रोता
जब भाव निकल कर आते हैं
और गीतों में ढल जाते हैं
जब उनकी धुन में बजने से
ये साज सभी घबराते हैं
तब ऐसे में मैं शरमा कर
बस होठों को सी लेता हूँ
वैसे तो मुझको पसंद नहीं
बस ऐसे में पी लेता हूँ.

जब पंछी सारे सोते हैं
या उल्लू बाग में रोते हैं
जब फूलों की खूशबू वाले
ये हवा के झोंके होते हैं
जब बिजली गुल हो जाती है
और नींद नहीं आ पाती है
जब दूर देश की कुछ यादें
इस दिल में घर कर जाती हैं
तब ऐसे में मैं क्या करता
रख लम्बी चुप्पी लेता हूँ
वैसे तो मुझको पसंद नहीं
बस ऐसे में पी लेता हूँ.

चिट्ठाकारी विशेष:

जब ढेरों टिप्पणी मिलती हैं
या मुश्किल उनकी गिनती है
जब कोई कहे अब मत लिखना
बस आपसे इतनी विनती है
जब माहौल कहीं गरमाता हो
या कोई मिलने आता हो
जब ब्लॉगर मीट में कोई हमें
ईमेल भेज बुलवाता हो.
तब ऐसे में मैं खुश होकर
बस प्यार की झप्पी लेता हूँ
वैसे तो मुझको पसंद नहीं
बस ऐसे में पी लेता हूँ.

--समीर लाल 'समीर'

 

अब आप ही बताओ, कितना मजबूर हो जाता हूँ मैं!!

मंगलवार, नवंबर 17, 2009

काश!! आशा पर आकाश के बदले देश टिका होता!!

काश!! आशा पर आकाश के बदले देश टिका होता!! वैसे सही मायने में, टिका तो आशा पर ही है.

जिन्दगी की दृष्टावलि उतनी हसीन नहीं होती जितनी फिल्मों में दिखती है. इसमें बैकग्राऊंड म्यूजिक म्यूट होता है, वरना तो जाने कब के गाँव जाकर बस गये होते. मुल्ला मचान पर बैठे, खेतों में नाचते गाते-मेरे देश की धरती, सोना उगले से..जिन्दगी नहीं कटा करती. काम करना पड़ता है और फिर किस्मत. वो तो दो कौड़ी की भी हिस्से में नहीं आई. बिना मशक्कत वो भी नहीं आती निठ्ठलों के हाथ.

शहर में नल में पानी नहीं आता और न अधिकतर समय बिजली-खेत में खों खों करते क्या खाक सिंचाई करोगे?

बारिश है कि ससुरी, बरसती ही नहीं. गरमी हालत खराब किये रहती है.

किस लिये ऐसा हो रहा है, सोचा कभी-पेड़ काटने के पहले और पेड़ न लगाने के बाद?

आशा लगाये बैठे हो चातक की तरह मूँह बाये कि हे बादल!! आ जाओ. बादल तो आते हैं मगर वो नहीं जिन्हें बुलाया. उनके न आने से संकट के बादल छाने लगते हैं. लो आ गये, बुलाये थे न!! काहे नहीं साफ साफ कहे, कि हे पानी वाले बादल, आ जाओ. मारे अनुष्ठान और यज्ञ सब कर डाले मगर डिमांड, एकदम अगड़मबगड़म!! तो लो, बादल मांगे थे, बादल आ गये-संकट के बादल छा गये.

flood

और फिर तुम रोने लगते हो. अपनी गलती मानने तैयार ही नहीं. तुमको जार जार रोता देख, संयम खोता देख, भगवान भी रहम खा जाता है और हड़बड़ी में इतने सारे बादल भेज देता है कि बाढ़ आने लगती है.

बादल आये मगर इतने आये कि साथ फिर संकट के बादल ले आये.

इस बार भी तुमने साफ साफ नहीं बताया कि बस, काम भर के पानी वाले बादल भेजना. बस, रोने लग गये कि वो रोता देख समझ ही जायेगा.

वैसी ही आशा सरकार से करते हो. ७०% को तो पता ही नहीं कि चाहिये क्या सरकार से. बस, जिस मूँह सुनो तित-सरकार कुछ करती ही नहीं और लगे रोने.

कितनी गलत बात करते हो कि सरकार कुछ करती ही नहीं. इतना सारा तो कर रही है, देखो, सरकार तुमको लूट रही है. सरकार मँहगाई बढ़ा रही है. सरकार भ्रष्टाचार मचा रही है. सरकार विद्वेष फैला रही है. सरकार पाकिस्तान से साठ साल से शांति वार्ता चला रही है. सरकार गद्दी बचा रही है. सरकार गठबंधन कर रही है. सरकार अपने देश पर ही हमला करने वालों को माफ करने में लगी है, सरकार देश के भीतर भाषा के आधार पर विघटन का सपना संजोए लोगों को मौन रह समर्थन दे रही है, सरकार ये कर रही है, सरकार वो कर रही है..अब क्या जान लोगे सरकार की. इत्ते के बाद भी कोई समय बच रहेगा क्या कि वो खोजे तुम क्या चाहते हो उससे करवाना?

कितने आराम से निश्चिंत होकर पान दबाये घर लौट आते हो ठेले पर बतिया कर. काम नहीं मिला, सरकार कुछ नहीं कर रही. खाना नहीं बना, सरकार जिम्मेदार. बच्चे को नौकरी नहीं मिल रही, सरकार जिम्मेदार. इलाज के आभाव में पिता जी गुजर गये, सरकार जिम्मेदार. बच्चा नहीं हुआ, सरकार जिम्मेदार, कुत्ते ने काट लिया, सरकार जिम्मेदार...और तुम, तुम्हारी जिम्मेदारी?

काहे चुने थे भाई ऐसी सरकार? साँप काटे था क्या?

बस, शाम शराब पिला दी या धमका दिया या कुछ रकम टिका दी और तुम समझे कि सब काम बन गया और लगा आये अपना सिक्का!! तो अब भुनाओ.

भईया मिले और कहने लगे कि हमें तो कोई पसंद ही नहीं इसलिये हम तो सिक्का लगाये ही नहीं और ऐन चुनाव के दिन, शहर से दूर, परिवार के साथ पिकनिक मना आये.

तो अब तुम्हारे हिस्से में पिकनिक ही बची है. खूब मनाईये और कोसिये सुबह शाम, कि सरकार कुछ नहीं कर रही.

किसी और ने नहीं चुनी है. तुमने नहीं चुनी, इससे क्या अंतर पड़ता है. भुगतना तो पड़ेगा तुम्हें ही उस पिकनिक के जश्न का मोल!!!

हर बात जीवन में अपना हिसाब माँगती है, एक तुम्हें छोड़कर.

जब भी मांगा हमने तुमसे, हक बतलाना भूल गये
तुम तो थे नादान मुसाफिर, आना जाना भूल गये
जैसा भी तुम कहते आये, हमने जीना सीख लिया
पर तुमसे आशा पानी की, क्यूँ बरसाना भूल गये.

-समीर लाल ’समीर’

गुरुवार, नवंबर 12, 2009

क्या पता-कल हो न हो!!-एक लघु कथा

मेरे घर के बाजू में मोड़ पर एक जंगल रहता है. जबसे इस घर में आया हूँ, तबसे उसे देखता आ रहा हूँ. उसे न कहीं आना और न कहीं जाना.

तरह तरह के पेड़ हैं. मौसम के हिसाब से पत्तियाँ रंग बदलती रहती है. हरे से लाल, फिर पीली और भूरी होकर पेड़ों का साथ छोड़ देती है बरफ गिरने से थोड़ा पहले.

बर्फिली आँधियों में जब पेड़ों को सबसे ज्यादा उनके साथ की जरुरत होती है , तब वो पत्तियाँ उनके साथ नहीं होती.

पेड़ अकेले अपने नंगे बदन पर मौसम की मार झेलते रहते है, कड़कड़ाती ठंड भर. सब तरफ सन्नाटा और अपने आपको, अपने अस्तित्व को बचाते, चुभती सर्दी की मार झेलते वो पेड़.

TreeStory

मगर दिन तो एक से नहीं रहते हमेशा. हर दुख के बाद एक सुख आता है.

ठंड भी बीत जाती है और आता है सुहाना मौसम, फिर गुनगुनी गरमी.

अच्छे वक्त में वो पत्ते भी वापस आ जाते हैं और वो पेड़, फिर उसी तरह स्वागत करते हैं उन पत्तियों का. उनके साथ हँसते है, खिलखिलाते है, खुश होते है. चिड़ियों के मधुर संगीत को सुनते हैं.

जानते है कि फिर सब चले जायेंगे मुसीबत में साथ छोड़ कर लेकिन उसके लिए क्या आज का खुशनुमा पल और साथ भी गँवा दें.

नहीं!! जितने दिन की भी हो, वे उस खुशी को भरपूर जीना जानते है और शायद यही खुशी और इसका इन्तजार उन्हें मुसीबत के दिनों में बर्फिली आँधी को झेल जाने की ताकत देता है.

प्रकृति के नियम और स्वभाव तो सब ही के लिए एक से हैं. फिर हम क्यूँ किसी और के व्यवहार के चलते अपने खुशी के समय को भी खराब कर लेते हैं.

जब मिले, जैसे मिले, खुशियाँ मनाओ! क्या पता-कल हो न हो!!

-

एक लहर आती है, एक लहर जाती है,
आपस में मिल कर खुशियाँ मनाती है

-आज फिर उनसे मुलाकात होने को है.

-समीर लाल ’समीर’

मंगलवार, नवंबर 10, 2009

चिट्ठाचर्चा और मैं..

कल रात वापस लौट आये दो दिवसीय मॉन्ट्रियल यात्रा से. कोई विशेष उल्लेखनीय कुछ भी नहीं. चाहें तो कहानी बनायें मगर अभी उद्देश्य कुछ और ही है.

शुक्रवार को मॉन्ट्रियल जाना पड़ा. वही ५.३० घंटे में ६०० किमी पूरा करने की आदत जिसमें आधे घंटे की कॉफी ब्रेक भी ली गई. एक बार आदत हो जाये तो कोई विशेष प्रयास नहीं करने होते. गाड़ी चालन में टोरंटो से मॉन्ट्रियल और वापसी भी आदत का हिस्सा सा ही बन गई है. बिना प्रयास ५.३० घंटे में जाना और उतने ही घंटे में वापसी.

कुछ ऐसा ही मेरे साथ टिप्पणी करने में भी है. कुछ खास प्रयास नहीं करने होते. बस, कुछ पढ़ा उर टिप्पणी हो ही जाती है. शायद आदत हो गई है इसलिए.

जब से ब्लॉग जगत में आया तकरीबन तब से ही चिट्ठाचर्चा पढ़ना भी आदत में शुमार हो गया. अच्छा लगता था सभी उल्लेखनीय पोस्टों की चर्चा एक ही जगह पढ़कर. जब भी कुछ लिखता था, इच्छा होती थी कि उसका उल्लेख भी चिट्ठाचर्चा में हो. शायद मेरे जैसे ही बहुतों को होती हो. फिर जब अपना उल्लेख चिट्ठाचर्चा में आया देखता तो मन पुलकित हो उठता.

सोचा करता था कि यह चर्चाकार किस आधार पर पोस्टों का चुनाव करते होंगे. कितना पढ़ना पड़ता होगा उन्हें, तब जाकर चर्चा कर पाते होंगे.

हमेशा कुछ ऐसे ही भाव मन में उमड़ते घुमड़ते रहते थे कि एकाएक एक दिन अनूप फुरसतिया जी ने मुझसे चिट्ठाचर्चा करने के लिए कहा. यकीन जानिये, पहली चर्चा करने के लिए मात्र लगभग १५ पोस्टों को मैने सारा दिन पढ़कर तब शाम को चर्चा की घबराते हुए.

अनूप जी और अन्य साथियों का खूब सहयोग और प्रोत्साहन मिला. फिर तो नियमित चर्चा करने की आदत सी बन गई.

मुझे याद आता है, उस वक्त संजय बैंगाणी जी मध्यान चर्चा किया करते थे. तब इतनी कम पोस्टें आती थी कि अक्सर मध्यान चर्चा में ही सारी पोस्टों का जिक्र हो जाता था तो रात में हमारे पास चर्चा करने को कुछ बाकी ही नहीं रह जाता था.

फिर जब पोस्टों की संख्या बढ़ने लगी तो बहुत प्रयासों के बाद भी बहुत सी पोस्टों का जिक्र छूट जाता. हमारे साथ रचना बजाज जी जुड़ीं और हम और रचना जी मिलकर अपने निर्धारित दिन चर्चा करने लगे..आधी हम लिखकर भेज देते और आगे आधी वो.

बहुत यादगार पल गुजरे चिट्ठाचर्चाकार मण्डली के सदस्य की हैसियत से. कभी मतभेद भी हुए, हिन्द युग्म में कॉपी पेस्ट का ताला लगा तो अच्छा खासा तूफान भी खड़ा किया इसी मंच से. फिर सब मामला रफा दफा हो गया. उस वक्त के विवादों में अच्छाई यह होती थी कि न तो कभी वो बहुत व्यक्तिगत हुए न ही कभी दीर्घकालिक. अनेक मुण्डलियाँ रची गई, लोगों द्वारा पसंद की गईं.

मुझसे एक दिन पहले शायद मंगलवार को गीतकार राकेश खण्डॆलवाल जी गीतों में चिट्ठाचर्चा किया करते थे जो कि चिट्ठाकारों के बीच खासा लोकप्रिय था.

समय बीतता रहा. अक्सर कोई चर्चाकार व्यक्तिगत वजहों से अपने निर्धारित दिन चर्चा न कर पाता तो अनूप जी डंडा लिए खड़े नजर आते कि चलिये, आज आप चर्चा किजिये. कभी अनूप जी लखनऊ निकल लिए तो टिका गये.

जब हम जरा सीनियर हुए चर्चामंडल में, तो हम भी यह गुर सीख गये और अपना निर्धारित दिन लोगों को टिकाने लगे.

टिकाते टिकाते मौका देखकर कब हम इस जिम्मेदारी से निकल भागे, खुद को भी समझ नहीं आ पाया.

फिर आदत तो आदत होती है, चर्चा न करने की आदत नई लग गई. आराम तो मिलने ही लगा जिम्मेदारी से भाग कर. बस, भाग निकले. निट्ठल्लों को भी निट्ठलाई में कितना आनन्द आता है, यह तब जाना और आज तक उसका आनन्द उठा रहे हैं जैसे हमारे नेता, फिर देश जाये भाड़ में, की तर्ज पर हमने भी चिट्ठाचर्चा तज दी.

जब आपको मेहनत न करनी हो, तो नुस्ख निकालना सरल होता है और अपने मेहनत न कर पाने की हीन भावना को मलहम भी लग जाता है, गल्तियाँ निकाल कर. सो, अन्य अनेकों की तरह आजकल वह भी कर लेते हैं कभी कभी. बड़ा स्वभाविक सा प्रोगरेशन है.

इन सबके बावजूद, आज भी जब कभी पोस्ट लिखते हैं तो उसके बाद आई चिट्ठाचर्चा में नजर अपनी पोस्ट तलाशती जरुर है. भले ही वो मिले या न मिले.

आज पता चला कि चिट्ठाचर्चा मंच से १००० वीं पोस्ट आ रही है. इस ऐतिहासिक दिवस पर इस मंच का हिस्सा होने का गर्व है, प्रसन्नता है और मेरी समस्त शुभकामनाएँ इस मन्च को और इससे जुड़े तमाम लोगों को.

आशा करता हूँ कि समय के साथ मंच और सुदृढ़ होता जायेगा और नये कीर्तिमान स्थापित करेगा.

हार्दिक बधाई एवं अनन्त शुभकामनाएँ.

गुरुवार, नवंबर 05, 2009

आसमानी रिश्ते भी टूट जाते हैं..

आज शाम से ही तेज आँधी चल रही थी. वह अपने कमरे की खिड़की से बैठा सामने लगे ऊँचे ऊँचे देवदार के पेड़ों को हवा के साथ बार बार झुकता और हवा कम हो जाने पर सीधा ख़ड़े होते देख रोमांचित हो रहा था. वह देख रहा था कि तेज अंधड़ न जाने कितने वृक्षों को जड़ से उखाड़ फैंका और अपने साथ ले उड़ा. हवा की सांय सांय की आवाज में उन वृक्षों की चरमराहट, टूटने की आवाजें सब दब कर रह जा रही थीं.

एकाएक उसे याद आया कि ऐसी ही एक आँधी, पलायन की आँधी, विकल्पहीनता के गर्भ से उठी बेहतर विकल्प की दिशा में बहती आँधी, जिसका मुकाबला करते जाने कितनी बार झुक कर वह सीधा खड़ा हो गया था किन्तु एक तेज झोके के साथ वह जड़ से उखड़ आ पड़ा था सात समुन्दर पार अमरीका में.

नये माहौल का उत्साह, बेहतर सुविधाओं की चमक दमक, अंतहीन विकल्प और जल्द ही वह आदी हो गया इन सब का. जड़ों से छूट जाने क दर्द यहाँ की तड़क भड़क की तेज रफ्तार भागती जिन्दगी में गुम होकर रह गया ठीक वैसे ही जैसे उसकी अपनी पहचान.

कभी खाली वक्त में वह जड़ों को याद भी करता, फोन लगता उनसे संपर्क स्थापित करने की कोशिश में ध्वनि तरंगों के माध्यम से किन्तु ध्वनि तरंगो में वह जुड़ाव कहाँ कि कुछ भी जुड़ सके. न स्पर्श और न गंध. शीघ्र ही वायुमंडल में वह विलुप्त हो जाती और जीवन फिर अपने उसी ढ़र्रे पर चल निकलता.

samsam

शादी हुई, बच्चे हुए. व्यस्तताऐं ऐसी कि सुरसा सा मूँह बाये बढ़ती ही गईं. माँ नहीं रहीं. हफ्ते भर को जड़ों तक जा अपना कर्तव्य पूरा कर फिर लौट आया. जल्द ही खबर आई कि पिता जी भी नहीं रहे. एक बार फिर वही कर्तव्य निर्वहन और वापसी. अब तो कोई और वजह भी न बची कि वह लौट सके.

समय गतिमान है और उसकी अपनी गति होती है. न तो वह आपका इन्तजार करता है और न ही वापस लौटता है. विजयी वह जो उसकी गति से अपनी गति मिला ले. न मिला पाये तो पराजित. माँ ने बताई थी कभी बचपन में यह बात उसे.

आज जब वह घर से निकल कर हाईवे में अपनी गाड़ी उतारता है तो हाई वे मिलाने वाली सड़क पर उसे अपनी गाड़ी की गति बढ़ाते बढ़ाते १०० के आसपास ले जाना होती है, तभी हाईवे पर तेज रफ्तार कारों के काफिले में वो शामिल हो पाता है. जब भी वह ऐसा करता है उसे माँ का बताया मंत्र समय का याद हो उठता है और माँ की याद जहन में आ जाती है. उस याद को सर झटक कर अलग करने का गुर भी वह इसी समय के साथ साथ सीख गया है और चल पड़ता है दफ्तर की ओर, एक नये दिन की नई शुरुवात करने.

बच्चे बड़े हुए. अपने अपने काम काजों से लग गये और एक बार फिर वही, अब बच्चे घर से दूर अपने लिए बेहतर विकल्प तलाशते. आश्चर्य होता है सदियों से ऐसा देख कर कि बेहतर विकल्प घर से दूर ही होते हैं अक्सर, न जाने क्यूँ. किस बात के लिए बेहतर विकल्प- क्या रोजगार के लिए, स्वतंत्र जिन्दगी के लिए, नया कुछ जानने के लिए कि बस, एक नया रोमांच.

अब वह खाली रहने लगा, न पहले की तरह काम करने की आवश्यक्ता रही और न ही तन में उतनी शक्ति. खाली मन स्वभावतः यादों की वादियों में टहलने का आदी होता है..तब वह कोई अजूबा नहीं. एक साधरण मानव ही तो है.

आज इस आँधी ने उसे बचपन के उस गाँव पहुँचा दिया, जहाँ उसने माँ की ऊँगली पकड़ कर चलना सीखा था. अपने पिता के विशाल व्यक्तित्व को अपना नायक माना था. पिता जी स्कूल में मास्टर थे और हृदय से कोमल होने के बावजूद अनुशासन के मामले में बेहद सख्त. पूरे गाँव के बच्चे उनसे डरा करते थे.

पिछले बरस, जब वह रिटायर हुआ तो उसके विभाग ने उसके इतने वर्षों के सेवाकाल के प्रसन्न हो उसे एक विदाई समारोह में प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया. आज वह प्रशस्ति पत्र ठीक इसी खि़ड़की के उपर फ्रेम में जड़ा टंगा है मगर अब जब वह याद करता है कि बचपन में उसे स्कूल की वाद विवाद प्रतियोगिता में जीत के लिए सरपंच महोदय के हाथों एक कप प्रदान कर सम्मानित किया गया था तो यह खुशी उस खुशी के सामने एकदम फीकी नजर आती है. पिताजी कितने खुश थे और स्टेज पर उठकर उन्होंने उससे हाथ मिला कर गले लगाया था. फिर शाम चन्दु हलवाई के यहाँ से रबड़ी लेकर आ गये थे.

एक बार दीवाली पर दादा जी ने उसे बाजार से सफेद धोती कुरता दिलवाया था. तब वह तैयार होकर हाथ में छड़ी ल्रेकर पिता जी बन गया था. पिता जी ने फोटोग्राफर मोहन चाचा को बुलवाकर अपनी गोद में बैठाकर उसकी तस्वीर खिंचवाई थी. अब न जाने वह तस्वीर भी कहाँ होगी. होती तो आज एक बार उसे फिर जरुर देखता. शायद गाँव में हो मगर कहाँ.

कहते हैं कि गाँव में कोई देखने वाला बचा नहीं. मकान ढह गया और फिर वहाँ कुछ दुकानें खुल गई. उस जमाने में तो कोई कागज पत्तर भी नहीं होते थे. होते तो भी अब तक कौन सहेजता जब वह खुद ही कभी वापस नहीं गया. शायद उसी मकान के मलबे के साथ फैक दी गई होंगी वह तस्वीरें भी और वह कप भी.

याद आते हैं वह खेत जहाँ अपने दादा के कँधों पर बैठकर वह रोज जाया करता था और वह दोस्त किश्नु और जगतारा, जिनके साथ वह स्कूल में पढ़ा और दोपहर भर खेला करता था. उसे याद आया कि एक बार किश्नु और जगतारा के साथ वह बिना किसी को बताये तालाब पर तैरने चला गया था और किश्नु डूबने लग गया था. तब उसने कितनी जोर जोर से हल्ला मचा कर सबको इक्कठा किया था और किश्नु को सबने बचा कर निकाल लिया था.

उस शाम तीनों को अपने अपने घर में खूब मार पड़ी थी. तब वह सुबकता हुआ अम्मा के पास दुबक गया था. अम्मा ने गरम दूध करके उसमें रोटी शक्कर डाल कर अपने हाथ से खिलाया था और फिर गरम पानी से उसकी सिकाई करती रही और वह सुबकते सुबकते सो गया था.

आज याद करते करते एकाएक उसका हाथ कंधे पर चला गया जहाँ उस रात सबसे ज्यादा दर्द था. एकाएक माँ का सिंकाई करना याद आया. आँखें नम हो गईं. मगर अब क्या, अब तो बस वह यादें ही शेष हैं और उन्हीं यादों की वादियों में माँ के स्पर्श का एहसास. कितनी देर कर दी उसने. अब गणित लगाने से भी क्या फायदा देर जल्दी का, क्या पाया क्या खोया का.

सोचता है तो लगता है क्या यही बेहतर विकल्प होता है जिसको पाने के लिए इन्सान अपना सर्वस्व खोता है.नहीं, शायद नहीं. यह तो शायद उम्र की उमंग होती है जो दूरदृष्टि के आभाव में यह समझ ही नहीं पाती कि क्या होता है वाकई बेहतर विकल्प और जब तक यह बात समझ आ पाती है, वापसी के सारे द्वार बंद हो चुके होते हैं और बच रहता है बस एक और एक मात्र विकल्प!! खिड़की पर बैठे नम आँखों से यादों की वादियों में विचरण!!!

आसमानी रिश्ते भी टूट जाते हैं..
बारिश यूँ ही बेवजह नहीं होती...

-आज फिर मेरी आँख बरसी है.

-समीर लाल ’समीर’

सोमवार, नवंबर 02, 2009

महान होने का अरमां..हाय!!!

हर व्यक्ति की इच्छा होती है कि वो महान कहलाये, अभी न भी सही, तो कम से कम मरणोपरांत.

हमारे एक मित्र तो इसी चक्कर में माला पहन कर अगरबत्ती समाने रखकर तस्वीर खिंचवा लिये कि घर में टंगी रहेगी. कोई माला पहनाये न पहनाये, अगरबत्ती जलाये न जलाये, तस्वीर महानता बरकरार रखेगी. साथ ही कुछ कार्ड छपवा कर फोटो के सामने रख दिये हैं..स्व. कुंदन लाल गुप्ता...क्या पता बाद में कोई स्वर्गीय कहे न कहे. जमाना तेजी से बदल रहा है.

एक मित्र नगर निगम को १५ लाख डोनेशन देकर मरे कि मरने के बाद चौराहा उनके नाम कर दे या एक सड़क का नाम, गलीनुमा ही सही, उनके नाम हो जाये. हुआ नहीं, सब खा पी गये, यह अलग बात है. उनकी दूरदृष्टि का दोष, कि ऐसे निकम्मे्पन को भाँप न पाये. हम और आप ही कहाँ भाँप पा रहे रहे हैं, हर बार हाय करके रह जाते हैं.

लोग वसीयत तक का फॉरमेट इस तरह बदल डाल रहे हैं कि उनकी महानता स्थापित हो पाये. गोया..मेरी जायजाद का आधा हिस्सा मेरे बेटे को उसी हालत में दिया जाये जबकि वो मेरी बाकी आधी जायदाद को इस्तेमाल कर मेरी स्मृति एक वृद्धाश्रम खोले.

क्या क्या नहीं करता इंसान अपना नाम कायम किए रहने के लिए और खुद को महान घोषित करवाने के लिए.

लोग जब मर जाते हैं तो लोग उनके कहे में से सुभाषित ढ़ूंढ़ते हैं. महात्मा गाँधी ने ये कहा, लूथर किंग ने ये कहा, हिटलर ऐसा कह गये. वो सिर्फ इतना कह कर मर नहीं गये. उन्होंने इससे लाख गुना कहा मगर उसमें से इतना भर सुनने लायक है जो उन्हें महान बनाता है.

वो तो रोज सुबह शाम ही कुछ न कुछ कहते ही रहते थे. उसमें से इतना ही है एक लाईना...सुनने लायक.  उनका काम ही कहना था...आप बस इतना सुनो..और उनकी महानता का जयकारा लगाओ. सारा सुन कुछ फायदा नहीं, वितृष्णा ही मिलेगी. खामखाँ मन खट्टा होगा, स्वास्थय बिगड़ेगा.

कौन जाने हमारे कहे में से ऐसे सुभाषित कोई खोजे न खोजे.. एक लईना में? कौन जाने कहीं कोट हो न हो. या फिर ऐसा भी हो सकता है कि कोई अपने नाम ही से हमारी कही महान बात न छाप जाये इस खराब जमाने में. किसे पता चलेगा कि इतनी बड़ी उड़नतश्तरी में ये कहाँ लिखा है. किसी का भरोसा तो रहा ही नहीं..

इसलिए हमने सोचा कि अभी तक लिखे में खुद ही छांट कर अलग कर दें इस टाईप के सुभाषित और फिर हर एक नियमित समयांतराल में करते चलेंगे. और कुछ ध्यान में न भी होंगे तो आप बता देना. इससे एक तो किसी और को मेहनत न करना पड़ेगी और महान बनने में सरलता रहेगी. बताईये, ठीक है क्या यह आईडिया?

statue

  • प्रशंसा और आलोचना में वही फर्क है जो सृजन और विंध्वस में.

 

  • गिनती सीधी गिनो या उल्टी, अंक वही होते हैं. सिर्फ क्रम बदल जाते हैं.

 

  • मैं और तू सामने वाले पास भी वही विकल्प प्रदान करते हैं मैं और तू वाले.

 

  • साहयता से गुरेज मात्र आत्म विश्वास का दिखावा है. हर व्यक्ति साहयता चाहता है.

 

  • एसी की आहर्ता रखने वाले को आप एसी का किराया देकर सिर्फ बुला सकते हैं जबकि तृतीय श्रेणी की आहर्ता रखने वाले को एसी का किराया देकर बुलाने पर आप उसे कुछ भी सुना सकते हैं.

 

  • शराब सोडे मे मिलाओ या सोडा शराब में. नशा शराब का ही होता है.

 

  • कलम की छांव में पलते शब्द आलसी हो जाते हैं. किसी काम के नहीं रहते. उन्हें ताप की जरुरत है.

 

  • कुनबा एकरस लोगों का हो, यह जरुरी न्हीं. सबकी अपनी राय और सबकी अपनी महत्ता होती है.

 

  • हर लिखा पठनीय हो, यह आवश्यक नहीं किन्तु हर पठनीय लिखा हो, यह जरुरी है और ब्लॉग यह सुविधा प्रदान करता है.

 

  • चिल्लर की तलाश में रुपये गँवाने वालों को सलाह है कि वो सरकारी नौकरी प्राप्त करने की कोशिश करें.

-समीर लाल 'समीर'

बताईयेगा, आपके क्या विचार हैं?

गुरुवार, अक्‍तूबर 29, 2009

पुल के उस पार से: इलाहाबाद दर्शन

जाने कितना नुकसान कर बैठा मैं हिन्दी साहित्य का इन पिछले चार दिनों में मात्र. सब माफ कर देंगे, सब मेरे अपने हैं मगर नहीं माफ करेगा मुझे तो हिन्दी साहित्य का इतिहास. वो मुझसे वैसे भी नहीं सध पाता.

न जाने क्या क्या निबंध, आलेख, शोध पत्र, संस्मरण आदि लिखे इन चार दिनों में और मिटा दिये मगर शीर्षक सहेज लिये कि शायद भविष्य में काम आयें.

आजकल यूँ भी पहले शीर्षक और फिर विषय वस्तु लिखी जाती है नये फैशन में. पहले विषय वस्तु के आधार पर शीर्षक निर्धारित होता था मगर वो पुराना जमाना था पुरनियों का.पुरानों की इज्जत करने वाले अब बचे भी नहीं. परसाई जी भी कह गये हैं कि बुजुर्गों को पूजनीय बना कर पूजागृह की शोभा बढ़ाने के लिए बैठा दिया जाता है. इसलिए जरा पुराना कहलाने से बचता हूँ और नये जमाने के साथ कदमताल करने का प्रयास रहता है. बस, और क्या! इसीलिये बचा लिए शीर्षक.

आप भी देखिये न..आगे इन पर एक एक करके फिर से लिखता रहूँगा शीर्षकानुसार:

  • निबंध: महाकुंभ के कुंभी
  • गंगा में पावन डुबकी-संस्मरण
  • दाना चुगते मानस के राजहंस-निबंध
  • जी हजूर!
  • ठेले पे मेला : किसने किसको झेला (हास्य विनोद)
  • दर्जा सभ्यता
  • सरकारी मेहमान : हमारे जजमान
  • लाईव रिपोर्टिंग : नॉट सो लाईव-समाचार विश्लेषण
  • गला मिलन समारोह
  • छुक छुक गाड़ी टू परयाग
  • बिना तिलक के पण्डे
  • तालियों की कराहट
  • बिन चहा (चाय) भजन नइ होवै
  • रिक्शे की सवारी: यात्रा वृतांत
  • रेत में नौका विहार का आनन्द: डूबने का खतरा नहीं
  • आस्था के दीपक का प्रवाहित होना: एक चिंतन
  • हँसमुख लाल की खिलखिलाहट
  • मइया तेरो बिकट प्रताप: एक मौलिक आरती
  • कागज के श्रृद्धा सुमन
  • शोध पत्र: चमकाऊ भाषण- एक कला या विज्ञान
  • विवेचना: मच्छर दंश: प्रेम प्रदर्शन या हमला
  • दो दिवस का एक युग: पौराणिक कथा
  • जासूसी कथा: कँघी गुमने का रहस्य
  • इलाहाबाद के पथ पर, वो तोड़ती थी पत्थर: २००९ में पनुः आंकलन
  • संगम- क्या मात्र तीन नदियों का: विमर्श
  • इलाहाबाद- राजनैतिक और धार्मिकता के केन्द्र के बाद-सन २००९ में सिंहावलोकन
  • गुल्लक कै पैसे: उसके कैसे- एक तुकबन्दी
  • घुटना टेक: छात्र जीवन का एक संस्मरण
  • शीर्षासन में देखी दुनिया जैसा: एक विचित्र अनुभव वृतांत
  • कव्वों की भीड में हंस या हंसों की भीड़ में कव्वा - एक मोरपंखी मुकुटधारी की रिपोर्ट
  • मंदिर से अजान: बदलते फैशन पर एक विशेषज्ञ की राय
  • साधना का महत्व: ज्ञानवार्ता
  • इलाहाबाद से हरिद्वार जाती गंगा में नौका विहार
  • शेषनाग की शैय्या के खाली स्थान पर लंबलेट: एक थ्रिलर
  • हाशिये पर ढकेलती: उंगली वाली बंदूक - एक कविता
  • तुम्ही अब नाथ हमारे हो: एक स्वीकारोक्ति.

इन्तजार करियेगा इनका. आते रहेंगे समय बे समय. मैं लिखूँ या कोई और-क्या फरक पड़ता है. कुछ शीर्षकों के लिए तस्वीरें इक्कठी करने का काम भी शुरु कर दिया है. एक तो रंजना भाटिया जी के यहाँ से चुरा ली है और बाकी गुगल से. बाकी का जुगाड़ भी हो ही जायेगा.

blogger meet

boat

corner

मैं जब भी घर से कहीं किसी और शहर कुछ दिन के लिए जाता हूँ तो मेरी आदत है कि सामान रखने के पहले इत्मिनान से बैठ कर लिस्ट बना लेता हूँ फिर सामान मिलान करके रखता हूँ ताकि कुछ छूट न जाये. हर बार नये अनुभव प्राप्त होते हैं तो लिस्ट बढ़ती घटती रहती है. अभी अभी नये प्राप्त अनुभवों से लिस्ट में कुछ सामान और जोड़ दिये है, शायद आगे काम आये अगर कहीं बुलाये गये. दो दिन के लिए तीन दिन का सामान ले जाना हमेशा ठीक रहता
है उस हिसाब से:

तीन शर्ट, तीन फुल पेण्ट, एक हॉफ पैण्ट (नदी स्नान के लिए), एक तौलिया, एक गमझा (नदी पर ले जाने), एक जोड़ी जूता, एक जोड़ी चप्पल, तीन बनियान, तीन अण्डरवियर, दो पजामा, दो कुर्ता, मंजन, बुरुश, दाढ़ी बनाने का सामान, साबुन, तेल, दो कंघी ( एक गुम जाये तो), शाम के लिए कछुआ छाप अगरबत्ती, रात के लिए ओडोमॉस, क्रीम, इत्र, जूता पॉलिस, जूते का ब्रश, चार रुमाल, धूप का चश्मा, नजर का चश्मा, नहाने का मग्गा, बेड टी का इन्तजाम (एक छोटी सी केतली बिजली वाली, १० डिप डिप चाय, थोड़ी शाक्कर, पावडर मिल्क, दो कप, एक चम्मच), एक मोमबत्ती, माचिस, एक चेन, एक ताला, दो चादर,  एक हवा वाला तकिया.

बाकी इलेक्ट्रॉनिक आइटम की सूची अलग से है.

मुझे तो लगता है कि लिस्ट पूरी है, कुछ छूटा हो तो बताना.

खैर, यह सब तो ठीक है लेकिन जाने इसी दौरान यह कविता कलम का सहारा लेकर उतर आई. थोड़ी गंभीर है, अतः निवेदन है कि जरा डूब कर भाव समझने का प्रयास करें. सोचता था कि इस कविता को अलग से प्रस्तुत करुँगा मगर दो मूड और एक पोस्ट की तर्ज पर प्रस्तुत कर ही देता हूँ:

मैं हाशिये पर हूँ

इसलिये नहीं कि

मुझे हाशिये में रहना पसंद है

इसलिये नहीं कि

मुझमें ताकत नहीं

इसलिये नहीं कि

मैं योग्यता

नहीं रखता..

मैं इसलिये हाशिये पर हूँ क्यूँकि

मैं बस मौन रहा और

उनके कृत्यों पर

मंद मंद मुस्कराता रहा!!

-समीर लाल ’समीर’